चुनाव में गड़बड़ी की अटकलों पर आधारित निवारक हिरासत टिकाऊ नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Shahadat

22 April 2026 7:28 PM IST

  • चुनाव में गड़बड़ी की अटकलों पर आधारित निवारक हिरासत टिकाऊ नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि संसदीय चुनावों में गड़बड़ी की अटकलों पर आधारित हिरासत का आदेश, बिना किसी सीधे या ठोस सबूत के, 'लाइव नेक्सस' (सीधे जुड़ाव) की शर्त को पूरा करने में नाकाम रहता है और उसे रद्द किया जा सकता है।

    कोर्ट 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम, 1978 की धारा 8 के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश में हिरासत में लिए गए व्यक्ति पर राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया।

    जस्टिस वसीम सादिक नरगल की बेंच ने टिप्पणी की:

    "इस मामले में हिरासत को 2024 के संसदीय चुनावों में संभावित गड़बड़ी के आधार पर सही ठहराने की कोशिश की गई... हालांकि, यह आशंका केवल अटकलों पर आधारित लगती है। समय बीतने के साथ इसकी प्रासंगिकता खत्म हो जाती है... हिरासत में लिए गए व्यक्ति पर ऐसा कोई सीधा या हालिया काम करने का आरोप नहीं है, जिससे इस आशंका को सही ठहराया जा सके।"

    बेंच ने आगे कहा,

    "इस कोर्ट का मानना ​​है कि हिरासत के आधारों में सीधे जुड़ाव की कमी है और वे ठोस सबूतों के बजाय केवल आशंका पर आधारित हैं। इससे निवारक हिरासत को जारी रखने के लिए ज़रूरी 'लाइव लिंक' (सीधा जुड़ाव) टूट जाता है। इस आधार पर भी हिरासत के आदेश को जारी नहीं रखा जा सकता।"

    हिरासत में लिए गए व्यक्ति को बारामूला के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा जारी आदेश के तहत निवारक हिरासत में रखा गया। यह आदेश पुलिस की रिपोर्ट (Dossier) पर आधारित था, जिसमें आरोप लगाया गया कि उस व्यक्ति की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं।

    याचिकाकर्ता ने कई आधारों पर हिरासत को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि आरोप अस्पष्ट थे, किसी ठोस सबूत से समर्थित नहीं थे और जिस उद्देश्य को हासिल करने की कोशिश की जा रही थी, उससे उनका कोई सीधा संबंध नहीं था। यह भी तर्क दिया गया कि हिरासत केवल संसदीय चुनावों के दौरान संभावित गड़बड़ी से जुड़ी आशंका पर आधारित थी।

    याचिकाकर्ता ने 'बिना सोचे-समझे फैसला लेने' (Non-Application of Mind) का आधार भी उठाया। उसने आरोप लगाया कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने बिना किसी स्वतंत्र मूल्यांकन के पुलिस की रिपोर्ट को ज्यों का त्यों दोहरा दिया। यह भी तर्क दिया गया कि जिन सबूतों पर भरोसा किया गया, वे हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उपलब्ध नहीं कराए गए और हिरासत के आधार उसे ऐसी भाषा में नहीं बताए गए, जिसे वह समझ सके।

    प्रतिवादियों ने यह दावा करते हुए हिरासत का बचाव किया कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति ऐसी गतिविधियों में शामिल था, जिनसे राज्य की सुरक्षा को खतरा था, और यह कि सभी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का विधिवत पालन किया गया।

    Case Title: Maqsad Ali Kohli v. Union Territory of J&K & Ors.

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