फैसले से पहले वैवाहिक अदालतों को सुलह की कोशिश करनी चाहिए, तलाक की याचिकाओं पर आम प्रक्रिया लागू नहीं होती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

Shahadat

25 Jun 2026 7:33 PM IST

  • फैसले से पहले वैवाहिक अदालतों को सुलह की कोशिश करनी चाहिए, तलाक की याचिकाओं पर आम प्रक्रिया लागू नहीं होती: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत वैवाहिक याचिकाओं पर सुनवाई करने वाली अदालतों को सबसे पहले सुलह की कोशिश करनी चाहिए, जैसा कि अधिनियम की धारा 23(2) और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 32-A की भावना के तहत ज़रूरी है। वे आपसी समझौते की गुंजाइश तलाशे बिना जवाब या आपत्तियां दाखिल करने पर ज़ोर नहीं दे सकतीं।

    ये टिप्पणियां भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सुपरवाइज़री अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं। यह याचिका एक पत्नी ने दायर की थी जो इस बात से नाराज़ थी कि सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत उसके पति द्वारा दायर तलाक की याचिका पर कैसे काम कर रही थी। अदालत तलाक की याचिका को एक आम सिविल केस की तरह देख रही थी और उसने शुरुआत में मध्यस्थता या सुलह की कोई कोशिश नहीं की थी।

    जस्टिस राहुल भारती की सिंगल बेंच ने कहा,

    "हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 23(2) के तहत वैवाहिक झगड़े को सुलझाने या आपसी समझौते की गुंजाइश तलाशने की कोशिश किए बिना, सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत ने प्रतिवादी से जवाब/आपत्तियां मांगने का तरीका अपनाया।"

    बेंच ने कहा,

    "प्रतिवादी से जवाब दाखिल करने पर ज़ोर देने से पक्षों के बीच तनावपूर्ण वैवाहिक संबंध बेहतर नहीं होंगे। इसलिए अदालत को पहले सुलह की संभावना तलाशनी चाहिए और उसके विफल होने पर ही तलाक की याचिका के मामले में आगे बढ़ना चाहिए।"

    याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट अमित गुप्ता और एडवोकेट राजीव चारगोत्रा ​​पेश हुए। प्रतिवादी खुद पेश हुआ।

    इस मामले में पक्षकारों के बीच शादी में खटास आ गई, जिसके कारण प्रतिवादी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत में तलाक की याचिका दायर की, जिसके बाद याचिकाकर्ता को समन भेजा गया।

    याचिकाकर्ता अपने वकील के ज़रिए पेश हुई। हालांकि, सुलह-समझौते की कोई कोशिश किए बिना और CPC के ऑर्डर 32-A की भावना को नज़रअंदाज़ करते हुए सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत ने याचिकाकर्ता-प्रतिवादी से जवाब/आपत्तियां मांगीं। अदालत ने उन्हें जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका भी दिया। साथ ही यह शर्त भी रखी कि अगर जवाब दाखिल नहीं किया गया तो जवाब-सह-आपत्ति दाखिल करने का उनका अधिकार खत्म मान लिया जाएगा।

    तलाक की याचिका पर जिस तरह से कार्रवाई हो रही थी, उससे नाराज़ होकर याचिकाकर्ता ने आर्टिकल 227 के तहत हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    अदालत की टिप्पणी

    हाईकोर्ट ने सबसे पहले निचली अदालत के पदनाम (डेज़िग्नेशन) में प्रक्रियात्मक चूक देखी।

    अदालत ने कहा,

    "... सिविल अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) के संदर्भ में सिविल कोर्ट का नाम इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि क्रिमिनल अधिकार क्षेत्र का। ट्रायल कोर्ट के पीठासीन अधिकारी ने 'प्रिंसिपल सेशंस जज, सांबा' के पदनाम के तहत आदेश पारित किया। प्रिंसिपल सेशंस जज के पास हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत वैवाहिक याचिका पर सुनवाई करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है। इसके बजाय आदेश पर 'प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज, सांबा' का पदनाम होना चाहिए था।"

    अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे निचली अदालतों (सिविल और क्रिमिनल दोनों) के सभी पीठासीन अधिकारियों को सूचित करें कि वे अपने अधिकार क्षेत्र के संदर्भ में अदालत की पहचान के प्रति संवेदनशील रहें।

    मुख्य मुद्दे पर अदालत ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 23(2) की जांच की, जिसके तहत अदालत को तलाक की याचिका पर सुनवाई शुरू करने से पहले पक्षों के बीच सुलह-समझौता कराने की हर संभव कोशिश करनी होती है। अदालत ने कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर, 1908 के ऑर्डर 32-A का भी ज़िक्र किया, जो परिवार से जुड़े मामलों में सिविल मुकदमों या कार्यवाही के दौरान अदालत पर यह ज़िम्मेदारी डालता है कि वह मामले की प्रकृति और परिस्थितियों के अनुसार, सबसे पहले पक्षों को समझौता करने में मदद करने की कोशिश करे।

    कोर्ट ने देखा कि फ़ाइल पर मौजूद किसी भी आदेश से यह पता नहीं चलता कि सुलह-सफ़ाई की कोशिश के बारे में कोई विचार किया गया हो।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    “यहीं पर सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट ने गलती की कि उसने याचिकाकर्ता को आपत्तियां दाखिल करने का आखिरी मौका दिया। वैवाहिक याचिका में प्रतिवादी द्वारा जवाब/आपत्तियां दाखिल करने का मतलब यह होगा कि याचिकाकर्ता को प्रतिवादी के तौर पर अपने ऊपर लगाए गए आरोपों के बारे में अपना पक्ष रखना होगा। प्रतिवादी से जवाब दाखिल करने पर ज़ोर देने से पक्षों के बीच तनावपूर्ण वैवाहिक संबंधों में सुधार नहीं होगा।”

    कोर्ट ने आगे कहा,

    “कोर्ट को पहले सुलह की संभावना तलाशनी चाहिए और उसके विफल होने पर ही तलाक की याचिका के मामले में आगे बढ़ना चाहिए। सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट को निर्देश दिया जाता है कि वह पहले सुलह या मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करे और अगर वह विफल रहती है, तभी मामले के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करे। इस संबंध में याचिकाकर्ता को प्रतिवादी के तौर पर तलाक की याचिका पर अपना जवाब/आपत्तियां दाखिल करने का मौका दिया जा सकता है।”

    इन निष्कर्षों के अनुरूप हाईकोर्ट ने अपने पर्यवेक्षी अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए याचिका का निपटारा किया और सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज की कोर्ट को निर्देश दिया कि वह पहले सुलह या मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करे। केवल इसके विफल होने पर ही कोर्ट को मामले के गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने का निर्देश दिया गया, जिसके बाद याचिकाकर्ता को तलाक की याचिका पर अपना जवाब/आपत्तियां दाखिल करने का मौका दिया जा सकता था।

    आदेश की एक प्रति सांबा के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को सभी न्यायिक अधिकारियों के बीच वितरण के लिए भेजने का निर्देश दिया गया।

    Case Title:Kanchan Devi v. Amit Sharma

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