CrPC की धारा 156(3) की प्रक्रिया का पालन किए बिना मजिस्ट्रेट प्रशासनिक विवाद को आपराधिक मामला नहीं बना सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

  • CrPC की धारा 156(3) की प्रक्रिया का पालन किए बिना मजिस्ट्रेट प्रशासनिक विवाद को आपराधिक मामला नहीं बना सकते: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट किसी प्रशासनिक विवाद को आपराधिक कार्यवाही में नहीं बदल सकते। ऐसा वे किसी ऐसी अर्ज़ी के आधार पर FIR दर्ज करने का आदेश देकर नहीं कर सकते, जिसमें खुद FIR दर्ज करने की मांग न की गई हो, और न ही CrPC की धारा 156(3) के तहत शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़े सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना ऐसा कर सकते हैं।

    कोर्ट ने साफ़ किया कि जब किसी पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) के सामने रखी गई जानकारी किसी प्रशासनिक मुद्दे से जुड़ी हो तो उसे सिर्फ़ इसलिए आपराधिक शिकायत नहीं माना जा सकता कि उसमें ज़बरदस्ती घुसने (Trespass) या नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए; खासकर तब, जब FIR दर्ज करने का आदेश देने के लिए ज़रूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन न किया गया हो।

    कोर्ट थानामंडी के तत्कालीन तहसीलदार और थानामंडी नगर समिति के कार्यकारी अधिकारी (Executive Officer) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने थानामंडी के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) के आदेश पर RPC की धारा 447-A और 427 के तहत दर्ज FIR को चुनौती दी।

    जस्टिस संजय धर ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने FIR दर्ज करने का आदेश देकर "न केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रियंका श्रीवास्तव और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2015 (6) SCC 287) मामले में तय प्रक्रिया का उल्लंघन किया, बल्कि पूरी तरह से प्रशासनिक मामले को आपराधिक रंग भी दे दिया।"

    यह विवाद तब शुरू हुआ, जब थानामंडी मुंसिफ़ कोर्ट के चौकीदार ने पीठासीन अधिकारी को बताया कि कुछ लोगों ने कोर्ट परिसर में घुसकर दुकानों के निर्माण के लिए सीमांकन (Demarcation) किया और कथित तौर पर कंटीले तार को नुकसान पहुंचाया। जानकारी में बताया गया कि तहसील कार्यालय और नगरपालिका के कर्मचारियों ने यह सीमांकन किया।

    इसके बाद मजिस्ट्रेट ने थानामंडी पुलिस स्टेशन के SHO को तहसीलदार और कार्यकारी अधिकारी के ख़िलाफ़ FIR दर्ज करने और मामले की जांच करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के पास जाने से पहले न तो पुलिस स्टेशन और न ही SSP से संपर्क किया, जैसा कि CrPC की धारा 154(1) और 154(3) के तहत ज़रूरी है, और आवेदन के साथ कोई हलफनामा भी नहीं लगाया गया। उन्होंने आगे कहा कि वे केवल SDM, थानामंडी और डिप्टी कमिश्नर, राजौरी के निर्देशों का पालन कर रहे थे, जो PMGSY सड़क परियोजना के लिए अधिग्रहित ज़मीन के हस्तांतरण से संबंधित थे।

    मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस धर ने पाया कि संबंधित ज़मीन रेवेन्यू डिपार्टमेंट के नाम दर्ज थी, लेकिन लंबे समय से मुंसिफ़ कोर्ट, थानामंडी के कब्ज़े में है।

    याचिकाकर्ताओं को रेवेन्यू डिपार्टमेंट के वरिष्ठ अधिकारियों ने निर्देश दिया कि वे ज़मीन उस निजी व्यक्ति को सौंप दें, जिसकी ज़मीन PMGSY के तहत सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई। इन्हीं निर्देशों के तहत मुंसिफ़ कोर्ट के कब्ज़े वाली ज़मीन के एक हिस्से की सीमांकन (Demarcation) की प्रक्रिया की गई।

    कोर्ट ने पाया कि चौकीदार द्वारा दिया गया आवेदन सही मायने में CrPC की धारा 156(3) के तहत शिकायत नहीं थी। इसमें केवल पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) का ध्यान कोर्ट के कब्ज़े वाली ज़मीन के एक हिस्से पर कब्ज़ा करने की कथित कोशिश की ओर दिलाया गया और इसमें FIR दर्ज करने की कोई मांग नहीं की गई।

    कोर्ट ने देखा कि आवेदन प्रशासनिक क्षमता में किसी वरिष्ठ अधिकारी के सामने रखी गई जानकारी जैसा लग रहा था। ऐसी स्थिति में, सही तरीका यह था कि मामले को प्रशासनिक विचार के लिए डिस्ट्रिक्ट जज और हाईकोर्ट के सामने रखा जाता। इसके बजाय, मजिस्ट्रेट ने जानकारी को आपराधिक शिकायत माना और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया।

    कोर्ट ने माना कि ऐसा करना कानूनी रूप से सही नहीं है और विशेष रूप से प्रियंका श्रीवास्तव मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सुरक्षा उपायों का हवाला दिया, जो CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने के निर्देश मांगने वाले आवेदनों पर लागू होते हैं।

    नतीजतन, कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट के निर्देश पर दर्ज की गई FIR कानूनन सही नहीं थी। साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के उस व्यवहार को सही नहीं माना, जिसमें उन्होंने उस ज़मीन पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, जो कई सालों से मुंसिफ़ कोर्ट के कब्ज़े में है। इस बारे में पीठासीन अधिकारी या ज़िला जज को कोई जानकारी नहीं दी।

    कोर्ट ने कहा कि ऐसा व्यवहार "याचिकाकर्ताओं और उनके वरिष्ठ अधिकारियों की मनमानी को साफ़ तौर पर दिखाता है," और यह तय किया कि इस मामले को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाया जाना चाहिए।

    इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने विवादित FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही रद्द की। साथ ही हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को राजौरी के डिप्टी कमिश्नर के साथ इस मामले पर बात करने की अनुमति दी, ताकि इस विवाद को प्रशासनिक तौर पर सुलझाया जा सके।

    Case Title: Qadeer-Ul-Rehman and Another v. State of J&K and Another


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