जम्मू-कश्मीर पुलिस नियम | पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की रिपोर्ट ज़िला मजिस्ट्रेट को न देने से कार्यवाही रद्द हो जाती है: हाईकोर्ट

Shahadat

10 March 2026 7:10 PM IST

  • जम्मू-कश्मीर पुलिस नियम | पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की रिपोर्ट ज़िला मजिस्ट्रेट को न देने से कार्यवाही रद्द हो जाती है: हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख के हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 349 में दिए गए प्रावधान अनिवार्य हैं, और जब तक किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत का सार - जिस पर अपनी ड्यूटी के दौरान रणबीर दंड संहिता के तहत अपराध करने का आरोप है - ज़िला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट नहीं किया जाता, तब तक पुलिस या मजिस्ट्रेट द्वारा शुरू की गई कार्यवाही अमान्य हो जाएगी।

    कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें किश्तवाड़ के सेशन जज द्वारा पारित आदेश रद्द करने की मांग की गई। इस आदेश के तहत पुनर्विचार कोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द किया, जिसमें याचिकाकर्ताओं - जो पुलिस अधिकारी थे - को आपराधिक कार्यवाही से बरी कर दिया गया।

    जस्टिस संजय धर की पीठ ने टिप्पणी की,

    "जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 349 में दिए गए प्रावधान प्रकृति में अनिवार्य हैं। जब तक किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत का सार - जिस पर अपनी ड्यूटी के दौरान रणबीर दंड संहिता के तहत अपराध करने का आरोप है - ज़िला मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट नहीं किया जाता (चाहे पुलिस द्वारा या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा, जिसके समक्ष ऐसे पुलिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत की गई है), तब तक पुलिस या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की कार्रवाई अमान्य हो जाएगी।"

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह याचिका उन आपराधिक कार्यवाहियों से उत्पन्न हुई, जो याचिकाकर्ताओं - जो सेवारत पुलिस अधिकारी थे - के खिलाफ रणबीर दंड संहिता के तहत अपराधों के आरोपों के संबंध में शुरू की गईं। जांच के बाद पुलिस ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक चालान पेश किया जिसमें आरोपी व्यक्तियों पर मुकदमा चलाने की मांग की गई।

    जब याचिकाकर्ता किश्तवाड़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश हुए तो उन्होंने इस आधार पर बरी किए जाने की मांग की कि उनके खिलाफ मुकदमा शुरू करने से पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 349 के अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में कथित रूप से किए गए कार्यों के लिए उन पर मुकदमा चलाने से पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत मंजूरी (sanction) की आवश्यकता थी।

    उनके तर्क को स्वीकार करते हुए ट्रायल मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ताओं को कार्यवाही से बरी किया, जबकि शेष आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ मामले को जारी रखने की अनुमति दी। हालांकि, बरी करने के इस आदेश को किश्तवाड़ के सेशन जज के समक्ष चुनौती दी गई, जिन्होंने मजिस्ट्रेट का फैसला रद्द किया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भी आपराधिक कार्यवाही जारी रहनी चाहिए। इस फैसले से व्यथित होकर याचिकाकर्ताओं ने अपनी अंतर्निहित अधिकारिता (inherent jurisdiction) का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    अदालत की टिप्पणी:

    जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 349 के दायरे की जांच करते हुए जस्टिस धर ने कहा कि इस प्रावधान के तहत यह ज़रूरी है कि जब भी किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ़ कोई शिकायत की जाती है कि उसने कथित तौर पर अपनी सरकारी ड्यूटी के दौरान कोई अपराध किया तो उस शिकायत का सार (मुख्य बातें) डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को बताया जाना चाहिए।

    अदालत ने समझाया कि यह प्रक्रियागत सुरक्षा उपाय एक सुरक्षा तंत्र के तौर पर काम करता है, जिसका मकसद पुलिस अधिकारियों को उन झूठी या बेबुनियाद शिकायतों से बचाना है, जो उनकी ड्यूटी की प्रकृति के कारण पैदा हो सकती हैं।

    अदालत ने आगे कहा कि ऐसी शिकायतों का सार डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को बताने की शर्त सिर्फ़ एक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह अनिवार्य है। अगर इसका पालन नहीं किया जाता है तो इसके बाद की सारी कार्यवाही रद्द हो जाएगी।

    अदालत ने पाया कि मौजूदा मामले में जांच एजेंसी और मजिस्ट्रेट, दोनों ने ही याचिकाकर्ताओं के खिलाफ़ आगे बढ़ने से पहले नियम 349 में दी गई शर्त को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया था। अदालत के मुताबिक, इस प्रक्रियागत चूक ने अभियोजन (मुकदमे) की बुनियाद पर ही चोट की। अदालत ने यह भी कहा कि पुनरीक्षण अदालत (revisional court) ने ट्रायल मजिस्ट्रेट द्वारा याचिकाकर्ताओं को बरी करने के आदेश में दखल देते समय इस अहम पहलू की जांच नहीं की थी।

    यह मानते हुए कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ उनकी सरकारी ड्यूटी के दौरान किए गए कथित कामों के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करते समय नियम 349 के तहत दी गई सुरक्षा को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि पुनरीक्षण अदालत का आदेश कानूनी तौर पर दोषपूर्ण था।

    याचिका को मंज़ूर करते हुए, हाई कोर्ट ने सेशन जज, किश्तवाड़ का आदेश रद्द किया और चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट का आदेश सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को आपराधिक कार्यवाही से बरी कर दिया गया। अदालत ने फ़ैसला दिया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस नियमों के नियम 349 की अनिवार्य शर्त का पालन न करने के कारण याचिकाकर्ताओं के खिलाफ़ की गई कार्यवाही कानून की नज़र में टिकने लायक नहीं थी।

    Case Title:Mohammad Yaseen & Anr v. State

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