'POCSO मामले में आरोपी को सबक सिखाने के लिए जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता': जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
Praveen Mishra
1 Aug 2026 12:16 PM IST

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को सबक सिखाने या समाज की अंतरात्मा को संतुष्ट करने के लिए जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना मुकदमे से पहले ही उसे दंडित करने के समान होगा, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।
जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने यह टिप्पणी POCSO अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत दर्ज मामले में आरोपी निसार अहमद जू को नियमित जमानत देते हुए की।
मामला नवंबर 2024 में दर्ज एक गुमशुदगी की रिपोर्ट से जुड़ा है। जांच के दौरान नाबालिग पीड़िता बरामद हुई और उसने आरोप लगाया कि उसके साथ अलग-अलग स्थानों पर चार व्यक्तियों ने यौन उत्पीड़न किया। आगे की जांच में याचिकाकर्ता को गिरफ्तार किया गया तथा उसके खिलाफ पूरक आरोपपत्र दाखिल किया गया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पीड़िता ने जांच और ट्रायल के दौरान अलग-अलग बयान दिए, उसके बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं और डीएनए रिपोर्ट भी उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों का समर्थन नहीं करती। वहीं, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि आरोप गंभीर हैं और आरोपी के रिहा होने पर गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है।
हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO अधिनियम की धारा 29 के तहत दोष का वैधानिक अनुमान अंतिम नहीं बल्कि खंडनीय (rebuttable) है। अदालत ने पाया कि ट्रायल के दौरान सामने आए साक्ष्यों, पीड़िता के विरोधाभासी बयानों, डीएनए रिपोर्ट और अन्य परिस्थितियों ने अभियोजन के मामले को प्रथम दृष्टया कमजोर कर दिया है।
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता लगभग एक वर्ष से न्यायिक हिरासत में है और पीड़िता सहित प्रमुख गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं, इसलिए गवाहों को प्रभावित करने की आशंका भी नहीं बचती।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर जब आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया संदेहास्पद हो। अदालत ने जमानत याचिका स्वीकार करते हुए आरोपी को रिहा करने का निर्देश दिया।


