फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में नागरिकता साबित करने की पूरी जिम्मेदारी व्यक्ति की, सिर्फ मौखिक दावे पर्याप्त नहीं : गुवाहाटी हाईकोर्ट

Praveen Mishra

25 May 2026 4:29 PM IST

  • फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में नागरिकता साबित करने की पूरी जिम्मेदारी व्यक्ति की, सिर्फ मौखिक दावे पर्याप्त नहीं : गुवाहाटी हाईकोर्ट

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा है कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष नागरिकता साबित करने का पूरा भार संबंधित व्यक्ति (प्रोसीडी) पर होता है और इसे केवल अस्पष्ट दलीलों, विरोधाभासी वोटर लिस्ट या बिना प्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर पूरा नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस प्रांजल दास की खंडपीठ डाबिर रहमान द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में वर्ष 2018 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उसे 25 मार्च 1971 के बाद भारत आया विदेशी घोषित किया गया था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि Foreigners Act, 1946 की धारा 9 के तहत यह कानून पूरी तरह स्पष्ट है कि भारतीय नागरिक होने का प्रमाण देने की जिम्मेदारी केवल संबंधित व्यक्ति की होती है और यह जिम्मेदारी कभी राज्य पर नहीं जाती। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रावधान में नॉन-ऑब्स्टेंट क्लॉज होने के कारण भारतीय साक्ष्य अधिनियम के सामान्य नियम यहां लागू नहीं होते।

    कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की लिखित दलीलें कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती थीं। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को अपनी जन्मतिथि, जन्मस्थान, माता-पिता के नाम, उनके जन्मस्थान और नागरिकता का स्पष्ट विवरण देना आवश्यक होता है, लेकिन याचिकाकर्ता ऐसा करने में विफल रहा।

    याचिकाकर्ता ने अपनी नागरिकता साबित करने के लिए 1966, 1971, 1997 और 2018 की वोटर लिस्ट, वोटर आईडी, एनआरसी रसीद, लेगेसी डेटा कोड और गांवबुड़ा प्रमाणपत्र पर भरोसा किया था। उसका कहना था कि राज्य की ओर से कोई जवाबी साक्ष्य पेश नहीं किया गया, इसलिए ट्रिब्यूनल को उसके दस्तावेज स्वीकार करने चाहिए थे।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने दस्तावेजों में कई विरोधाभास पाए। अदालत ने कहा कि 1966 और 1971 की वोटर लिस्ट लिंक दस्तावेज के रूप में पर्याप्त नहीं थीं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अलग-अलग वोटर लिस्ट में माता-पिता के नाम और गांव के नामों में अंतर था। इसके अलावा, जिन वोटर लिस्ट का उल्लेख किया गया था, उनमें से कुछ को रिकॉर्ड पर साबित ही नहीं किया गया।

    अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि याचिकाकर्ता की उम्र 1997 में 45 वर्ष थी, तो उसका नाम पहले की वोटर लिस्ट में क्यों नहीं था। कोर्ट ने कहा कि 25 वर्षों से अधिक का बड़ा अंतर बिना किसी संतोषजनक स्पष्टीकरण के छोड़ दिया गया।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल मौखिक गवाही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसे समकालीन दस्तावेजी साक्ष्यों से समर्थन मिलना जरूरी है। अंत में अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने में विफल रहा है।

    इसी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें याचिकाकर्ता को विदेशी घोषित किया गया था।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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