हाईकोर्ट ने खारिज की लाल किले पर इंडियन आर्मी के शहीदों के लिए स्मारक बनाने की PIL

  • हाईकोर्ट ने खारिज की लाल किले पर इंडियन आर्मी के शहीदों के लिए स्मारक बनाने की PIL

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को उस PIL पर सुनवाई करने से इनकार किया, जिसमें भारत की आज़ादी की लड़ाई में इंडियन नेशनल आर्मी (INA) के शहीदों के योगदान और बलिदान को सम्मान देने के लिए शहर के लाल किले पर एक समर्पित स्मारक बनाने की मांग की गई थी।

    चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने कहा कि लाल किले पर स्मारक बनाया जाए या नहीं, यह सरकार का फैसला है और कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता।

    यह याचिका 'महान स्वतंत्रता सेनानी ललती राम ट्रस्ट' ने दायर की थी। ट्रस्ट ने 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेश) की मांग की थी ताकि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (ASI) को स्मारक बनाने के लिए ज़रूरी और तेज़ी से कदम उठाने का निर्देश दिया जा सके।

    ट्रस्ट का मुख्य तर्क यह था कि केंद्र सरकार ने खुद 2 अगस्त 2021 को लोकसभा में एक लिखित जवाब में कहा कि उसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कई प्रस्तावों को मंज़ूरी दी, जिसमें "लाल किले में INA शहीदों के लिए स्मारक बनाने" का प्रस्ताव भी शामिल है।

    याचिका के अनुसार, उस बयान के बावजूद, प्रस्ताव के मुताबिक लाल किले पर INA शहीदों के लिए कोई समर्पित स्मारक नहीं बनाया गया।

    याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि सरकारी प्रस्ताव को लागू करने के लिए 'रिट ऑफ़ मैंडमस' कैसे जारी किया जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "आइए कुछ कानूनी बात करते हैं। 'रिट ऑफ़ मैंडमस' क्या है? क्या निर्देश देना है? जो भी आपके मन में आए, जो भी आपको अच्छा लगे, क्या उसके लिए निर्देश जारी किया जा सकता है?... क्या आप सम्मान के साथ तभी जी पाएंगे जब स्मारक बनेगा, और वरना नहीं? यह कैसी याचिका है?"

    कोर्ट ने आगे कहा कि 'रिट ऑफ़ मैंडमस' जारी करने के लिए याचिकाकर्ता को भारत के संविधान के तहत कोई आधार या किसी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का मामला दिखाना होगा।

    अदालत ने कहा,

    “स्मारक बनाना किसी कर्तव्य या अधिकार से जुड़ा नहीं है। हम ऐसा निर्देश कैसे दे सकते हैं? हम सरकार को लाल किले में ज़मीन आवंटित करने और स्मारक बनाने का निर्देश कैसे दे सकते हैं?”

    चीफ जस्टिस ने आगे कहा कि किसी व्यक्ति के सम्मान में स्मारक बनाया जाए या नहीं, यह अदालत में बहस का मुद्दा नहीं हो सकता।

    चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की,

    “क्या यह कानूनी रूप से विचार करने योग्य मुद्दा है? जिन शहीदों के सम्मान में आप स्मारक बनाना चाहते हैं, उनकी कोई बुराई नहीं करता, लेकिन क्या यह रिट याचिका का विषय बन सकता है? कौन नहीं चाहेगा कि भारत स्वर्ग बन जाए? तो क्या हमें इसके लिए 'मैन्डमस' (अदालत का आदेश) जारी करना चाहिए?”

    याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने कहा कि PIB की प्रेस विज्ञप्तियों के ज़रिए की गई घोषणाएं, अपने आप में किसी अधिकार की मांग का आधार नहीं बन सकतीं।

    अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित केंद्रीय मंत्रालय से संपर्क करने और दस्तावेज़ों के साथ एक विस्तृत प्रतिवेदन (Representation) देने की छूट दी।

    अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रतिवेदन दिया जाता है तो उस पर कानून के अनुसार निर्णय लिया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि अदालत की टिप्पणियों या आदेश को पक्षों के दावों की असलियत पर अदालत की राय नहीं माना जाना चाहिए।

    Case Title : Mahan Swatantrata Senani Lalti Ram Trust v. UNION OF INDIA AND ORS

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