सहमति से बने रिश्तों के टूटने को अपराध नहीं बनाया जा सकता: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, ब्रेकअप को बलात्कार कानून का हथियार न बनाएं
Praveen Mishra
22 Jan 2026 4:16 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि वयस्कों के बीच सहमति से बने रिश्ते के टूटने को बलात्कार कानून का सहारा लेकर अपराध का रूप नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि असफल या टूटे हुए रिश्तों को आपराधिक रंग देना कानून का दुरुपयोग है।
जस्टिस स्वर्णकांत शर्मा ने कहा कि एक शिक्षित और स्वतंत्र वयस्क व्यक्ति, जो अपनी स्वतंत्र और सचेत इच्छा से किसी सहमति-आधारित रिश्ते में प्रवेश करता है, उसे यह समझना चाहिए कि सिर्फ़ रिश्ता टूट जाने भर से आपराधिक जिम्मेदारी उत्पन्न नहीं होती।
अदालत ने कहा,
“किसी रिश्ते का समाप्त होना अपने आप में अपराध नहीं है। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, संयम और दोनों व्यक्तियों की स्वायत्तता व पसंद का सम्मान आवश्यक है।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि वयस्कों द्वारा स्वेच्छा से शुरू किए गए रोमांटिक रिश्तों में अनिश्चितताएँ अंतर्निहित होती हैं।
जस्टिस शर्मा ने कहा कि कई लोग परिपक्वता के साथ रिश्ते के टूटने को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन कुछ मामलों में भावनात्मक आघात, निराशा या आहत भावनाएँ आगे की कार्रवाइयों को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे हालात में आरोप कभी-कभी अपराध से अधिक व्यक्तिगत शिकायत पर आधारित हो सकते हैं। इसलिए, जहाँ रिकॉर्ड पर वयस्कों के बीच सहमति से बना रिश्ता दिखाई देता हो, वहाँ अदालतों को विशेष सावधानी और विवेक से काम लेना चाहिए।
ये टिप्पणियाँ जस्टिस शर्मा ने उस मामले में कीं, जिसमें उन्होंने एक महिला द्वारा एक पुरुष के खिलाफ दर्ज बलात्कार और जाति-आधारित अत्याचार से संबंधित एफआईआर को रद्द कर दिया। एफआईआर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 376 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(v) के तहत दर्ज की गई थी।
महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर उससे भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक शोषण किया।
हालाँकि, एफआईआर रद्द करते हुए अदालत ने कहा कि व्हाट्सऐप चैट्स से यह संकेत मिलता है कि सबसे पहले प्रेम और स्नेह की अभिव्यक्ति स्वयं शिकायतकर्ता ने की थी। चैट्स में कहीं भी तत्काल विरोध, दबाव, पीड़ा या किसी प्रकार के ज़बरदस्ती के संकेत नहीं दिखते।
अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद बातचीत में शादी का कोई आश्वासन या वादा आरोपी की ओर से नहीं पाया गया।
जस्टिस शर्मा ने टिप्पणी की,
“पूरी बातचीत को समग्र रूप से पढ़ने पर यह एक सहमति-आधारित रोमांटिक रिश्ता प्रतीत होता है, न कि विवाह के वादे पर आधारित कोई संबंध।”
अदालत ने आगे कहा कि यह मामला एक असफल रिश्ते का उदाहरण है, जहाँ पुरुष द्वारा रिश्ते से पीछे हटने के निर्णय को स्वीकार नहीं किया गया और उसके परिणामस्वरूप आपराधिक कार्यवाही का सहारा लिया गया।
जस्टिस शर्मा ने चेतावनी दी कि
“ऐसे दंडात्मक प्रावधानों का दुरुपयोग, जो वास्तविक पीड़ितों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं, न केवल कानून के उद्देश्य को कमजोर करता है, बल्कि झूठी या तुच्छ एफआईआर के जरिए आपराधिक न्याय प्रणाली पर अनावश्यक बोझ भी डालता है।”

