पत्नी का पति को "सांवले रंग का" या "मोटे शरीर वाला" कहना तलाक देने के लिए काफ़ी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

  • पत्नी का पति को सांवले रंग का या मोटे शरीर वाला कहना तलाक देने के लिए काफ़ी नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी का पति को "सांवले रंग का" या "मोटे शरीर वाला" कहना, अकेले तलाक देने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी सबूत के सिर्फ़ आरोप लगाने से तलाक नहीं दिया जा सकता।

    जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच पति द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील फ़ैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 19 (1) के तहत दायर की गई, जिसमें पति ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्ज़ी खारिज करने वाले फ़ैमिली कोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी थी। पति का आरोप है कि पत्नी उसके साथ बुरा बर्ताव करती है, उसे झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती है और अक्सर अपने मायके चली जाती है।

    कोर्ट ने पाया कि अपील करने वाले पति ने पत्नी द्वारा क्रूरता और घर छोड़कर चले जाने (डेज़र्शन) की बात साबित नहीं की, जिसके आधार पर शादी खत्म करने का आदेश दिया जा सके।

    कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा पत्नी पर लगाए गए आरोपों को ठोस सबूतों से साबित नहीं किया गया। कोर्ट ने माना कि पति द्वारा लगाए गए आरोप उसे तलाक देने के लिए काफ़ी नहीं हैं।

    '...उसने आरोप लगाया कि पत्नी उसे सांवले रंग का या मोटे शरीर वाला कहती थी, लेकिन ये बातें उसे तलाक देने का काफ़ी आधार नहीं मानी जा सकतीं।' घर छोड़कर चले जाने (डेज़र्शन) के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि पति यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी बिना किसी वाजिब वजह के अपने माता-पिता के साथ रह रही थी, जबकि उसे पति के परिवार वालों ने ज़बरदस्ती भेजा था। कोर्ट ने पत्नी की इस बात पर भी ध्यान दिया कि पति ने उसे वापस लाने या अपने साथ रखने की कोई कोशिश नहीं की।

    कोर्ट ने समर घोष बनाम जया घोष मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया और कहा:

    “अगर इस मामले के तथ्यों और हालात का विश्लेषण किया जाए तो रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके आधार पर पत्नी के काम को ऊपर बताए गए मामले में बताई गई क्रूरता की श्रेणी में रखा जा सके।”

    कोर्ट ने पाया कि हालांकि पति ने कई आरोप लगाए, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया, इसलिए उसके पक्ष में तलाक की डिक्री देने का कोई आधार नहीं है।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने माना कि पति ज़रूरी 'अनिमस डेज़र्ंडेन्डी' (छोड़कर जाने का इरादा) साबित करने में नाकाम रहा और शादी खत्म करने की अर्ज़ी को फैमिली कोर्ट द्वारा खारिज करने के फ़ैसले में दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं थी। अपील बिना किसी खर्च के खारिज कर दी गई।

    Case Title: Akash Ghosh v. Smt. Pooja Seet [FA(MAT) No. 325 of 2024]

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