छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: महिला आयोग कर्मचारी की सेवा शर्तों को प्रभावित करने वाले बाध्यकारी निर्देश नहीं दे सकता

Praveen Mishra

25 Aug 2026 4:09 PM IST

  • छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: महिला आयोग कर्मचारी की सेवा शर्तों को प्रभावित करने वाले बाध्यकारी निर्देश नहीं दे सकता

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि राज्य महिला आयोग महिलाओं के अधिकारों से वंचित किए जाने से जुड़ी शिकायतें प्राप्त कर सकता है, लेकिन किसी कर्मचारी की सेवा शर्तों को प्रभावित करने वाले बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं कर सकता। आयोग का अधिकार क्षेत्र केवल शिकायतों पर उचित कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों को सिफारिश करने और सुविधा प्रदान करने तक सीमित है।

    जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की पीठ एक सरकारी स्कूल के प्राचार्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग द्वारा 6 जुलाई 2026 को पारित उस कार्यवाही और सिफारिश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे वर्तमान पदस्थापना से दूसरे ब्लॉक में स्थानांतरित करने की सिफारिश की गई थी। यह मामला उसके प्रशासनिक नियंत्रण में कार्यरत एक सहायक शिक्षिका की शिकायत से जुड़ा था।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि महिला आयोग ने ऐसी शक्ति का इस्तेमाल किया जो उसे कानून के तहत प्राप्त ही नहीं है और इस प्रकार आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर उसकी सेवा संबंधी अधिकारों में हस्तक्षेप किया।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

    हाईकोर्ट ने Bhabani Prasad Jena v. Convenor Secretary, Orissa State Commission for Women मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्य महिला आयोग शिकायतें प्राप्त कर सकता है और उचित राहत के लिए संबंधित अधिकारियों के समक्ष मामला उठा सकता है, लेकिन उसे पक्षकारों के अधिकारों का न्यायनिर्णयन करने या उन्हें तय करने की शक्ति नहीं दी गई है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि महिला आयोग की शक्तियां महिलाओं के अधिकारों से संबंधित शिकायतों पर कार्रवाई के लिए संबंधित प्राधिकरण को मामला भेजने तक सीमित हैं। आयोग किसी कर्मचारी की सेवा शर्तों को प्रभावित करने वाले बाध्यकारी निर्देश या आदेश जारी नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा कि आयोग का अधिकार क्षेत्र “recommendatory and facilitative” यानी सिफारिशात्मक और सुविधाजनक प्रकृति का है। इसे ऐसी शक्ति प्रदान नहीं की जा सकती, जो संबंधित कानून में दी ही नहीं गई है।

    सिर्फ 'सिफारिश' कहने से कार्रवाई वैध नहीं हो जाती

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आदेश को केवल 'सिफारिश' कह देने से उसकी वास्तविक प्रकृति नहीं बदल जाती। आदेश के वास्तविक प्रभाव और उसके सार को देखा जाना आवश्यक है।

    कोर्ट ने पाया कि आयोग ने याचिकाकर्ता के स्थानांतरण जैसी विशिष्ट सेवा कार्रवाई की सिफारिश की थी और सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे एक निश्चित समयसीमा में लागू करने को कहा था। ऐसी कार्रवाई के लिए स्पष्ट वैधानिक अधिकार होना आवश्यक था।

    इस आधार पर हाईकोर्ट ने 6 जुलाई 2026 की महिला आयोग की कार्यवाही और सिफारिश को अधिकार क्षेत्र से बाहर (without jurisdiction) करार दिया और याचिका स्वीकार करते हुए उसे रद्द कर दिया।

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    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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