धारा 498A के मामले में पति का बरी होना यह साबित नहीं करता कि पत्नी ने झूठे क्रूरता के आरोप लगाए: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Praveen Mishra
21 Oct 2026 3:56 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत दर्ज आपराधिक मामले में पति के बरी होने मात्र से यह साबित नहीं होता कि पत्नी द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोप झूठे थे। वैवाहिक विवाद में क्रूरता हुई या नहीं, इसका निर्धारण वैवाहिक कार्यवाही में उपलब्ध समस्त साक्ष्यों की समग्र जांच के आधार पर किया जाना चाहिए।
जस्टिस पार्थ प्रीतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की खंडपीठ पति की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने तलाक की मांग वाली याचिका खारिज करने के फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।
पति ने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी ने दहेज उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज कराकर उसे और उसके परिवार के सदस्यों को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। इन शिकायतों के आधार पर उसके और परिवार के सदस्यों के खिलाफ IPC की धारा 498A के साथ धारा 34 के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।
पति का तर्क था कि आपराधिक मामले में उसके बरी होने से यह साबित हो गया कि पत्नी के आरोप झूठे थे और उसका आचरण मानसिक क्रूरता के समान था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि पति की ओर से पेश किए गए गवाहों को पक्षकारों के बीच हुई कथित घटनाओं की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी। उनके बयान मुख्य रूप से दूसरों से सुनी गई बातों पर आधारित थे।
अदालत को ऐसा कोई ठोस साक्ष्य भी नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी ने बिना किसी उचित कारण के पति का साथ छोड़ दिया था या वह व्यभिचार में रह रही थी।
आपराधिक मामले में बरी होना क्रूरता के आरोपों को झूठा साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं
क्रूरता के आरोपों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 498A IPC के तहत पति का बरी होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप झूठे थे।
अदालत ने कहा कि यह निर्धारित करने के लिए कि वैवाहिक संबंधों में वास्तव में क्रूरता हुई थी या नहीं, वैवाहिक कार्यवाही में उपलब्ध सभी साक्ष्यों का समग्र रूप से मूल्यांकन करना आवश्यक है।
समझौते के बाद पत्नी को साथ रखने से इनकार करने के आचरण पर भी विचार
हाईकोर्ट ने IPC की धारा 307 के तहत दर्ज एक अन्य आपराधिक मामले में हुए समझौते की परिस्थितियों पर भी विचार किया। समझौते के कारण पत्नी ने पति के खिलाफ अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया, जिसके बाद पति को उस मामले में बरी कर दिया गया था।
हालांकि, अदालत ने पाया कि समझौते में निहित आश्वासन के बावजूद पति ने बाद में पत्नी के साथ रहने से इनकार कर दिया।
इस पर अदालत ने कहा कि पति का समझौते की शर्तों का पालन न करना और पत्नी को साथ रखने से इनकार करना उसके आचरण को दर्शाता है। यह परिस्थिति पत्नी के इस पक्ष का समर्थन करती है कि पति उसके साथ रहने को तैयार नहीं था और उसे क्रूरता का सामना करना पड़ रहा था।
तलाक देने से इनकार करने के फैमिली कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप नहीं
हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी की ओर से क्रूरता, परित्याग या व्यभिचार किए जाने के आरोपों को साबित करने के लिए पति कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं कर सका।
अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज करके कोई गलती नहीं की थी। इसलिए हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

