'स्वैच्छिक सहयोग' के नाम पर किसी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता, यह Article 22 का उल्लंघन: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Praveen Mishra
7 Aug 2026 1:54 PM IST

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि जांच एजेंसियां "स्वैच्छिक सहयोग (Voluntary Cooperation)" के नाम पर किसी व्यक्ति को अपनी हिरासत में रखकर गिरफ्तारी से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार नहीं कर सकतीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस के नियंत्रण में आने के बाद किसी नोटिस पर यह लिखवा लेना कि व्यक्ति स्वेच्छा से साथ जा रहा है, वास्तविक सहमति (Genuine Consent) का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
चीफ़ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने साइबर फ्रॉड मामले में एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर यह फैसला सुनाया।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि 28 जून 2026 को उसे हरियाणा के रोहतक स्थित घर से उठाकर पहले दिल्ली और फिर छत्तीसगढ़ ले जाया गया, लेकिन न तो उसे निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और न ही Transit Remand लिया गया। वहीं, राज्य सरकार का कहना था कि BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस दिए जाने के बाद वह स्वेच्छा से पुलिस के साथ गया था और 30 जून 2026 को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 28 जून से 30 जून तक लगातार पुलिस के नियंत्रण में रहा और कई राज्यों की यात्रा पुलिस की निगरानी में कराई गई। अदालत ने कहा कि Article 22 के तहत मिलने वाला संवैधानिक संरक्षण उसी समय लागू हो जाता है, जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता (Liberty) पर वास्तविक रूप से अंकुश लग जाता है, न कि केवल तब जब औपचारिक Arrest Memo तैयार किया जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जांच एजेंसियों की दलील स्वीकार कर ली जाए तो वे किसी भी व्यक्ति को "स्वैच्छिक सहयोग" के नाम पर अनिश्चित अवधि तक अपनी हिरासत में रख सकती हैं और बाद में सुविधानुसार गिरफ्तारी दिखाकर संवैधानिक सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी बना सकती हैं।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की हिरासत Article 22 और BNSS की धारा 187 का उल्लंघन थी। अदालत ने रिमांड आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता की तत्काल रिहाई का निर्देश दिया।


