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दीवानी वाद में वादी को अपने बल पर अपना पक्ष सिद्ध करना होता है, वह दूसरे पक्ष के दस्तावेजों से अपना पक्ष मजबूत नहीं कर सकताः गुवाहाटी हाईकोर्ट

LiveLaw News Network
20 Feb 2022 2:30 AM GMT
दीवानी वाद में वादी को अपने बल पर अपना पक्ष सिद्ध करना होता है, वह दूसरे पक्ष के दस्तावेजों से अपना पक्ष मजबूत नहीं कर सकताः गुवाहाटी हाईकोर्ट
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गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दीवानी वाद में वादी को अपने बल पर अपना पक्ष सिद्ध करना होता है। वह दूसरे पक्ष के दस्तावेजों से अपना पक्ष मजबूत नहीं कर सकता। इन ‌टिप्‍पणियों के साथ‌ जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया ने संपत्ति स्वाम‌ित्व संबंधित एक मामले में निचली अदालतों के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

उन्होंने कहा,

" अपीलकर्ता (निचली अदालत में वादी) बिक्री विलेख को साबित करने में विफल रहा, इसलिए वह वाद भूमि पर अपना अधिकार साबित करने में विफल रहा। उपरोक्त कारणों से, इस अदालत ने पाया कि निचली अदालत के साथ-साथ प्रथम अपीलीय अदालत ने भी रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की सही ढंग से सराहना की और सही निष्कर्षों पर पहुंचे। इसलिए, यह अपील योग्यता रहित पाई जाती है और तदनुसार खारिज की जाती है। "

अपीलकर्ता के गवाह ने बिक्री विलेख, एक हस्तलिखित दस्तावेज पेश किया था। दस्तावेज के लेखक की अपीलकर्ता द्वारा जांच नहीं की गई थी। इसलिए, न्यायालय का विचार था कि रिकॉर्ड के आधार पर, बिक्री विलेख जिसके आधार पर अपीलकर्ता ने वाद भूमि पर स्वामित्व का दावा किया था, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 67 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार साबित नहीं हुआ है।

" जहां एक दस्तावेज एक व्यक्ति लिखता है और दूसरा उस पर हस्ताक्षर करता है, पहले की लिखावट और बाद वाले के हस्ताक्षर दोनों को साक्ष्य अधिनियम की धारा 67 के मद्देनजर साबित करना होता है। जब बिक्री विलेख (Ext 1), जिसके जर‌िए अपीलकर्ता ने वाद भूमि पर मालिकाना हक होने का दावा किया है, वह साबित नहीं होता है तो वाद भूमि पर अपीलकर्ता का अधिकार साबित नहीं होता है। इसलिए, यह साबित होता है कि अपीलकर्ता का कभी भी वाद भूमि पर अधिकार नहीं था।"

बेंच ने आगे कहा कि धारा 100 सीपीसी के तहत एक दूसरी अपील में, हाईकोर्ट के पास सीमित अधिकार क्षेत्र है और जब तक मामले में कानून का एक बड़ा सवाल शामिल नहीं है, तब तक यह सबूत या तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता है।

कोर्ट ने कहा कि सीपीसी की धारा 100 यह घोषणा करती है कि प्रथम अपीलीय अदालत तथ्यों पर अंतिम अदालत है।

कोर्ट ने कहा,

"हालांकि धारा 100 सीपीसी दूसरी अपील में हाईकोर्ट की शक्तियों से संबंधित है, जो यह घोषणा करती है कि पहली अपीलीय अदालत तथ्यों पर अंतिम अदालत है और दूसरी अपील में हाईकोर्ट सबूत या तथ्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता जब तक कि मामले में कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न ना शामिल हो। 1976 में धारा 100 सीपीसी में संशोधन किया गया था और इस तरह दूसरी अपील पर विचार करने के लिए हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर कठोर प्रतिबंध लगाया गया था। 1976 के संशोधन से पहले भी, पहली अपीलीय अदालत को तथ्यों की अंतिम अदालत के रूप में माना जाता था।"

हाईकोर्ट ने चुनीलाल बनाम मेहता एंड संस, लिमिटेड बनाम द सेंचुरी स्पिनिंग एंड एमएफजी कंपनी लिमिटेड एआईआर (1962) एससी 1314 का हवाला देते हुए दूसरी अपील में कानून के पर्याप्त प्रश्न के गठन पर विस्तार से बात की, जिससे सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि प्रश्न का समाधान उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है या प्रश्न को निर्धारित करने में लागू होने वाले सामान्य सिद्धांतों को अच्छी तरह से सुलझा लिया जाता है, तो कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है।

तदनुसार, हाईकोर्टने दूसरी अपील को खारिज कर दिया क्योंकि उसने इसे योग्यता से रहित पाया।

केस शीर्षक: मैसर्स गुवाहाटी रोलर फ्लोर मिल्स लिमिटेड बनाम श्रीमती प्रेमोदा मेधी और 2 अन्य

सिटेशन: 2022 लाइव लॉ (गुवाहाटी) 15

केस नंबर: आरएसए 35/2012

कोरम: जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया


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