NDPS मुकदमों में तेज़ी लाने और ड्रग्स की समस्या से निपटने की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को जारी किया नोटिस
Shahadat
10 Aug 2026 7:03 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को एक PIL पर नोटिस जारी किया। इस PIL में देश में ड्रग्स की समस्या से निपटने के लिए निर्देश देने की मांग की गई, जिसमें यह घोषणा भी शामिल है कि NDPS मामलों में सज़ा एक के बाद एक (consecutively) चलनी चाहिए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को इसी तरह के मुद्दों पर कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर शुरू किए गए मामले (2022) के साथ लिस्ट किया जाए।
सुनवाई के दौरान, वकील उपाध्याय ने तर्क दिया कि अखबारों में अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें ड्रग्स की लत के शिकार लोग अपने परिवारों को नुकसान पहुंचाते हैं।
CJI ने जवाब दिया कि यह समस्या वास्तव में बहुत गंभीर है और पूरे देश को प्रभावित करती है। हालांकि, जज ने कहा कि ड्रग्स की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ एजेंसियों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली मशीनरी के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।
इस बिंदु पर उपाध्याय ने सिंगापुर का उदाहरण दिया और कहा कि वह देश पूरी तरह से ड्रग-मुक्त है।
जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि सिंगापुर एक छोटा देश है, जिसकी प्रति व्यक्ति आय अधिक है, जबकि भारत की सीमा अफगानिस्तान और म्यांमार जैसे देशों से लगती है। जज ने कहा कि ऐसे मुद्दों को नियंत्रित करने में ये कारक महत्वपूर्ण हैं।
अंततः, बेंच ने नोटिस जारी किया और याचिका को लंबित स्वतः संज्ञान (suo motu) वाले मामले के साथ जोड़ दिया।
संक्षेप में मामला
PIL में केंद्र और राज्यों से निम्नलिखित के लिए निर्देश देने की मांग की गई:
(i) NDPS मामलों में FSL रिपोर्ट जमा करने के लिए एक अनिवार्य समय-सीमा तय करना।
(ii) कम और मध्यम मात्रा वाले मामलों में तलाशी, ज़ब्ती और सैंपलिंग के लिए SOP बनाना।
(iii) नए साइकोट्रोपिक पदार्थों की पहचान और समय पर शेड्यूलिंग के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन करना।
(iv) धारा 36 और 36A के तहत विशेष अदालतें बनाना और समयबद्ध जांच और त्वरित सुनवाई के लिए SOP तैयार करना।
इसमें अधिनियम की धारा 39 और 64A के तहत पुनर्वास केंद्र और अन्य कार्यक्रम स्थापित करने की भी मांग की गई। तलाशी, ज़ब्ती और इन्वेंट्री कार्यवाही की सैंपलिंग की अनिवार्य डिजिटल रिकॉर्डिंग और वीडियोग्राफी के लिए भी निर्देश मांगे गए।
याचिकाकर्ता ने एक श्रेणीबद्ध सज़ा नीति बनाने का भी अनुरोध किया, जिसके तहत एक तरफ तस्करों और फाइनेंसरों के लिए और दूसरी तरफ नशे के आदी लोगों और व्यक्तिगत उपयोग के लिए अपराध करने वालों के लिए सज़ा का प्रावधान उनकी भूमिका के अनुपात में हो। याचिका में नशीली दवाओं की लत से जुड़ी कई घटनाओं की रिपोर्ट का ज़िक्र किया गया। इसमें बताया गया कि हर साल नशीली दवाओं के गलत इस्तेमाल की वजह से लगभग 2 लाख लोगों की अप्राकृतिक मौत होती है और 20,000 लोग गंभीर शारीरिक और मानसिक बीमारियों का शिकार होते हैं।
इसमें ड्रग्स की तस्करी (जिसमें ड्रोन का इस्तेमाल भी शामिल है) के मुद्दे पर भी ज़ोर दिया गया और बताया गया कि 2025 में ड्रग्स से जुड़े मामलों में 53 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। ज़ब्त किए गए ड्रग्स में से 51% गांजा और 29% ओपिएट्स (अफीम से बने ड्रग्स) थे।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि अभी नए साइकोट्रोपिक पदार्थों (दिमाग पर असर करने वाले नशीले पदार्थ) की समय पर पहचान करने के लिए कोई स्थायी सिस्टम नहीं है। इससे सिंथेटिक ओपिओइड जैसे नए साइकोट्रोपिक पदार्थों का तेज़ी से प्रसार होता है, जो पारंपरिक नशीले पदार्थों की तुलना में कहीं ज़्यादा असरदार होते हैं।
उन्होंने देश में ड्रग्स के इस्तेमाल से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को भी रेखांकित किया। जिन चिंताओं को उठाया गया, उनमें ड्रग्स पर निर्भरता (डिपेंडेंस सिंड्रोम), डिप्रेशन, घरेलू हिंसा, जीवनसाथी की हत्या, तस्करी, अपराध, संगठित तस्करी और ड्रग्स से जुड़ी सड़क दुर्घटनाएं शामिल हैं।
गौरतलब है कि मई में CJI की बेंच ने पंजाब राज्य के अधिकारियों को राज्य में ड्रग्स के गलत इस्तेमाल और तस्करी से निपटने में उनकी विफलता के लिए फटकार लगाई थी। खास तौर पर CJI ने टिप्पणी की थी कि राज्य पुलिस पब्लिसिटी के लिए छोटे-मोटे ड्रग्स बेचने वालों को तो गिरफ्तार कर लेती है, लेकिन रैकेट चलाने वालों (जिनमें कुछ प्रभावशाली लोग भी शामिल हैं) के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहती है।
Case : ASHWINI KUMAR UPADHYAY v. UNION OF INDIA AND ORS. W.P.(Crl.) No. 288/2026


