एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याएं बढ़ रही हैं, संविधान ऐसे शॉर्टकट तरीकों को मंज़ूरी नहीं देता: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
Shahadat
19 Sept 2026 9:47 AM IST

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने देश में एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याओं (बिना कानूनी प्रक्रिया के हत्या) और पुलिस हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी पर चिंता जताई। उन्होंने उस तरीके पर सवाल उठाए, जिससे कभी-कभी आरोपियों को पुलिस कस्टडी में लिया जाता है और कथित एनकाउंटर या अन्य घटनाओं में मार दिया जाता है।
शुक्रवार को नई दिल्ली में 'सेंटर फॉर डिस्कोर्स ऑन क्रिमिनल एंड कॉन्स्टिट्यूशनल ज्यूरिस्प्रूडेंस' द्वारा आयोजित "आपराधिक मुकदमों में नैतिकता, मीडिया द्वारा ट्रायल और बयानों की स्वीकार्यता पर चर्चा" कार्यक्रम में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्हें पहले लगता था कि कस्टडी में हिंसा अतीत की बात हो गई है, लेकिन उन्हें अपनी इस सोच पर दोबारा विचार करना पड़ा।
उन्होंने कहा,
"मुझे लगा था कि कस्टडी में हिंसा अतीत की बात हो गई। लेकिन मुझे इस पर दोबारा विचार करना पड़ा। भारत में एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याएं बढ़ रही हैं।"
जस्टिस भुइयां ने आरोपियों को अजीब समय पर क्राइम-सीन रीकंस्ट्रक्शन (घटनास्थल का दोबारा दृश्य बनाना) जैसे कामों के लिए बाहर ले जाने की प्रथा पर भी सवाल उठाए, जबकि ऐसा करने की कोई खास ज़रूरत नहीं होती।
उन्होंने पूछा,
"आपको क्राइम सीन को दोबारा बनाने के लिए आरोपी को सुबह 3 बजे पुलिस कस्टडी में बाहर क्यों ले जाना पड़ता है? क्या आप सूरज उगने तक इंतज़ार नहीं कर सकते थे? इतनी बड़ी क्या ज़रूरत थी?"
जज ने कस्टडी में या ऐसी प्रक्रियाओं के दौरान आरोपी की मौत के बाद पुलिस द्वारा कभी-कभी दिए जाने वाले अलग-अलग स्पष्टीकरणों का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि इनमें ऐसे दावे शामिल हो सकते हैं कि आरोपी ने राइफल छीनने की कोशिश की, हाथापाई के दौरान गोली चल गई, या आरोपी को तेज़ रफ़्तार ट्रक ने टक्कर मार दी।
उन्होंने एक ऐसे मामले का भी ज़िक्र किया जिसमें कहा गया था कि आरोपी डिप्रेशन में था और कथित तौर पर कुएं में कूद गया।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि ऐसी घटनाओं से लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या जांच में कमियों को छिपाने के लिए "शॉर्टकट तरीके" अपनाए जा रहे हैं, खासकर तब जब जांच करने वालों को आपराधिक मुकदमे के संभावित नतीजे का पता हो।
उन्होंने कहा,
"समझदार लोग यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या यह जांच में कमियों को छिपाने का एक तरीका है; मुकदमे के नतीजे को अच्छी तरह जानते हुए भी ये शॉर्टकट तरीके अपनाए जाते हैं।"
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसी प्रथाएं भारत के संवैधानिक ढांचे के अनुकूल नहीं हैं।
जस्टिस भुइयां ने कहा,
"हमारा संवैधानिक सिस्टम इस तरह की स्थितियों को मंज़ूरी नहीं देता है।"
जज ने उन मामलों पर भी चिंता जताई, जिनमें युवा IPS अधिकारी प्रदर्शनकारियों पर व्यक्तिगत रूप से हमला करते दिखे। इस संदर्भ में, उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ज्यादतियों के बारे में किसी अन्य कार्यक्रम में अपनी पिछली टिप्पणियों को याद किया।
जस्टिस भुइयां ने कहा,
"लेकिन आप देखते हैं कि युवा IPS अधिकारी प्रदर्शनकारियों पर चेहरे पर इतना गुस्सा लिए व्यक्तिगत रूप से हमला कर रहे हैं। किसलिए? आप एक पेशेवर पुलिस अधिकारी हैं, आपको इतना उत्तेजित होने की क्या ज़रूरत है? प्रदर्शनकारी को नंगे हाथों से पीटना।"
उन्होंने कहा कि इस तरह का व्यवहार गंभीर चिंता पैदा करता है कि पुलिस हिरासत में खासकर रात के समय, किसी आरोपी के साथ क्या हो सकता है।
उन्होंने टिप्पणी की,
"यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि अगर ऐसा पुलिस अधिकारी रात में हिरासत में हो तो क्या होगा। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि रात में पुलिस हिरासत में किसी आरोपी के साथ क्या होगा? हममें से कई लोग लोगों को पुलिस हिरासत में भेजने से काफी डरते हैं, और ऐसा बिना किसी कारण के नहीं है।"
हाल ही में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कई आदेश पारित किए, जिनमें यूपी पुलिस द्वारा एनकाउंटर में हुई मौतों के लिए दी गई घिसी-पिटी कहानियों पर सवाल उठाए गए।
कार्यक्रम का वीडियो यहां देखा जा सकता है।

