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जेल अथॉरिटी को जमानत आदेशों को संप्रेषित करने में देरी मानवीय स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैः जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़

LiveLaw News Network
3 Nov 2021 9:08 AM GMT
जेल अथॉरिटी को जमानत आदेशों को संप्रेषित करने में देरी मानवीय स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैः जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़
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ज‌स्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और जिला कोर्ट स्थित ई-सेवा केंद्र और वर्चुअल कोर्ट के उद्घाटन के मौके पर कहा, "आपराधिक न्याय प्रणाली की बहुत ही बड़ी कमी जमानत आदेशों के संप्रेषण में होने वाली देरी है। इसे हमें युद्ध स्तर पर संबोधित करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह प्रत्येक विचाराधीन कैदी की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है या ऐसे दोषी को भी प्रभावित करता है, जिसकी सजा को सीआरपीसी की धारा 389 के तहत निलंबित किया गया है।"

उन्होंने कहा, चीफ जस्टिस एस मुरलीधर ने उड़ीसा हाईकोर्ट में ई-कस्टडी प्रमाण पत्र की पहल की है, ताकि प्रत्येक विचाराधीन और सजायाफ्ता दोषी के पास ई-कस्टडी प्रमाण पत्र हो। वह प्रमाणपत्र हमें उस विचाराधीन या दोषी के संबंध में सभी जरूरी डेटा देगा, शुरुआती रिमांड से मामले की बाद की प्रगति तक। इससे हमें यह सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी कि जमानत के आदेश जैसे ही दिए जाते हैं, वैसे ही उन्हें जेलों को तत्काल कार्यान्वयन के लिए सूचित कर दिया जाए।"

आर्यन खान के मामले ने जमानत आदेश के बावजूद रिहाई में देरी ने औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भी जेल से बंद कैद‌ियों की रिहाई में देरी का मुद्दा सामने ला दिया है। इस मामले में मुंबई सेंट्रल जेल में समय को लेकर बने कुछ नियमों के कारण खान की रिहाई में देरी हुई थी।

ज‌स्टिस चंद्रचूड़ ने ई-सेवा केंद्रों के महत्व पर कहा, "ई-सेवा केंद्र की क्या आवश्यकता है? परंपरागत रूप से, जैसा कि हम सूचना और संचार प्रौद्योगिकी को समझते हैं, हमें आईसीटी के लिए भौतिक केंद्र या स्थान की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप जहां भी हों आईसीटी तक पहुंच सकते हैं। हमें ई-सेवा केंद्र भारत में की आवश्यकता डिजिटल डिवाइड के कारण है। आबादी के एक बड़े हिस्से की कंप्यूटर तक पहुंच नहीं है, हालांकि अब स्मार्टफोन की संख्या हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ रही है। हालांकि डिजिटल ‌डिवाइड बहुत बड़ी है....हम इस तथ्य से वाकिफ हैं कि सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के साथ भारतीय न्यायपालिका के जुड़ाव को बढ़ाने का मिशन तब तक सफल नहीं होगा जब तक कि सबसे महत्वपूर्ण हितधारक, यानी नागरिक, वकीलों, और जजों की आईसीटी तक पहुंच नहीं होगी। इसलिए हमने महसूस किया कि नागरिकों को अदालत के पीछे दौड़ने या अदालत तक पहुंचने के बजाय अदालत को नागरिकों और वकीलों के पास आना चाहिए। ई-सेवा केंद्र का महत्व इसलिए एक छत के नीचे सभी सेवाएं प्रदान करना है, जिसे हम ई-कोर्ट परियोजना के तहत प्रदान करते हैं।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने बताया कि वर्चुअल कोर्ट भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रैफिक चालानों के निर्णयों के लिए देश भर में वर्चुअल कोर्ट स्थापित किए गए हैं। देश भर में 99.43 लाख मामलों को निस्तारित किया जा चुका है। जुर्माना लगाया गया है। 18.35 लाख मामलों में 119 करोड़ रुपये से अधिक जुर्माना वूसला गया है।

उन्होंने कहा, "आप कल्पना कर सकते है कि एक आम नागरिक के लिए एक दिन के लिए अपने कामकाज से दूर रहना और ट्रैफिक चालान का भुगतान करने के लिए अदालत जाना फायदेमंद नहीं है।"

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, अगर वर्चुअल अदालतों और एक राष्ट्रीयकृत बैंक, जहां चालान का भुगतान इलेक्ट्रॉनिक रूप से किया जा सकता है, के साथ के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाए तो नागरिकों के लिए जीत की स्थिति होगी। यह अदालतों के लिए अत्यंत उत्पादक होगा। उदाहरण के लिए, दिल्ली में 2 दर्जन जजों को ट्रैफिक चालान मामलों का निस्तारण करना पड़ता है, उन्हें अन्य मामलों के लिए मुक्त किया जा सकता है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि लंबित आपराधिक मामलों को समाप्त करने में प्रौद्योगिकी की मदद ली जा सकती है। उन्होंने कहा, "जिला न्यायपालिकाओं में 2 करोड़ 95 लाख आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से 77.5% मामले एक वर्ष से अधिक पुराने हैं। कई आपराधिक मामले इसलिए लंबित हैं क्योंकि आरोपी वर्षों से फरार हैं। जज के रूप में हम ये जानते हैं कि आपराधिक मामलों के निस्तारण में व‌िलंब का प्रमुख कारण आरोप‌ियों का फरार होना है, विशेषकर जमानत के बाद, और दूसरा कारण सबूत दर्ज करने के चरण में आधिकारिक गवाहों की अनुपस्थिति। यहां भी सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता हैं। सुप्रीम कोर्ट की ई-समिति में फ‌िलहाल हम यही काम कर रहे हैं।",

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