सिर्फ हस्ताक्षर से इनकार करने भर से जालसाजी साबित नहीं हो सकती, विशेषज्ञ राय जरूरी: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल किसी व्यक्ति द्वारा अपने हस्ताक्षरों से इनकार कर देने मात्र के आधार पर जालसाजी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जालसाजी का आरोप गंभीर नागरिक और आपराधिक परिणाम उत्पन्न करता है, इसलिए ऐसे निष्कर्ष केवल अनुमान या एकतरफा दावों के आधार पर नहीं दिए जा सकते।
जस्टिस पंकज पुरोहित की पीठ एक उचित मूल्य दुकान संचालक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
याचिका में ग्राम सभा के उस प्रस्ताव, जिला मजिस्ट्रेट के आदेश और अपीलीय प्राधिकारी के निर्णय को चुनौती दी गई, जिनके जरिए उसकी उचित मूल्य दुकान की अनुज्ञप्ति रद्द कर दी गई।
मामले की शुरुआत इस आरोप से हुई कि दुकानदार ने आवश्यक वस्तुओं के वितरण में अनियमितताएं कीं और स्टॉक रजिस्टर तथा उपभोग प्रमाणपत्रों पर फर्जी हस्ताक्षरों का इस्तेमाल किया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जालसाजी के आरोप पूरी तरह निराधार हैं और केवल पंचायत सचिव द्वारा हस्ताक्षरों से इनकार करने के आधार पर लगाए गए। यह भी दलील दी गई कि हस्ताक्षरों की सत्यता की जांच के लिए न तो किसी हस्तलेखन विशेषज्ञ की राय ली गई और न ही कोई वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारियों ने जालसाजी का निष्कर्ष मुख्य रूप से पंचायत सचिव के इनकार के आधार पर ही दर्ज किया।
अदालत ने कहा कि न तो जांच अधिकारी और न ही अन्य अधिकारियों ने विवादित हस्ताक्षरों का कोई वस्तुनिष्ठ सत्यापन कराया और न ही किसी विशेषज्ञ की राय प्राप्त की।
अदालत ने कहा,
"जालसाजी का निष्कर्ष गंभीर नागरिक परिणामों के साथ-साथ आपराधिक प्रभाव भी उत्पन्न करता है। इसलिए इसे केवल अनुमान या एकतरफा दावों के आधार पर कायम नहीं रखा जा सकता विशेषकर तब जब संबंधित व्यक्ति आरोपों का स्पष्ट रूप से खंडन कर हस्ताक्षरों को वास्तविक बता रहा हो।"
हाईकोर्ट ने माना कि 6 सितंबर 2021 को जिला प्रशासन द्वारा पारित अनुज्ञप्ति निरस्तीकरण आदेश और 21 मार्च 2022 का अपीलीय आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकते।
इसी आधार पर अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए दोनों आदेशों को रद्द किया और याचिकाकर्ता की उचित मूल्य दुकान बहाल करने का निर्देश दिया।
फैसले में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जालसाजी जैसे गंभीर आरोपों के मामलों में निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच आवश्यक है तथा बिना विशेषज्ञ राय या वस्तुनिष्ठ परीक्षण के ऐसे निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।