जिलाधिकारी के हस्ताक्षर बिना राशन दुकान लाइसेंस रद्द करने का आदेश अमान्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि यदि उचित मूल्य दुकान (राशन दुकान) का लाइसेंस रद्द करने वाले आदेश पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं तो ऐसा आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल किसी अन्य अधिकारी द्वारा आदेश की सूचना भेज देने से उसे जिलाधिकारी का वैध आदेश नहीं माना जा सकता।
जस्टिस पंकज पुरोहित की पीठ एक राशन दुकान संचालक की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
याचिकाकर्ता ने 19 नवंबर 2018 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके जरिए उसकी उचित मूल्य दुकान का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था। साथ ही उसने उस अपीलीय आदेश को भी चुनौती दी थी, जिसमें लाइसेंस निरस्तीकरण बरकरार रखा गया।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि लाइसेंस रद्द करने वाले आदेश के किसी भी पृष्ठ पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं। इसलिए इसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित आदेश नहीं माना जा सकता।
उसका यह भी कहना था कि आदेश वास्तव में जिला पूर्ति अधिकारी द्वारा जारी किया गया प्रतीत होता है, जबकि लाइसेंस रद्द करने का अधिकार उनके पास नहीं था।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मूल अभिलेख तलब किए और उधम सिंह नगर जिलाधिकारी कार्यालय के संबंधित लिपिक को भी अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया। अभिलेखों की जांच के बाद राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि विवादित आदेश पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे।
हालांकि, राज्य की ओर से दलील दी गई कि आदेश जिला पूर्ति अधिकारी के हस्ताक्षर से याचिकाकर्ता को भेजा गया, इसलिए इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित शासनादेश के अनुसार राशन दुकान का लाइसेंस रद्द करने का अधिकार केवल जिलाधिकारी को प्राप्त है। ऐसे में जब आदेश पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर ही नहीं हैं, तो उसे वैध आदेश नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
"जब आदेश पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षर नहीं हैं और वही शासनादेश के तहत लाइसेंस रद्द करने के लिए एकमात्र सक्षम प्राधिकारी हैं तो ऐसा आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता और प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त किए जाने योग्य है।"
अदालत ने माना कि सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और हस्ताक्षर के बिना पारित आदेश को वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती। इसलिए केवल किसी अन्य अधिकारी द्वारा उसे अग्रेषित कर देने से उसकी कानूनी कमी दूर नहीं होती।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 19 नवंबर 2018 के लाइसेंस निरस्तीकरण आदेश तथा उसके विरुद्ध पारित अपीलीय आदेश दोनों को रद्द किया।
फैसले में अदालत ने प्रशासनिक निर्णयों में विधिक प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की भूमिका के महत्व को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर या आवश्यक औपचारिकताओं के बिना पारित आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकते।