केवल पुराने मुकदमों के आधार पर गैंगस्टर एक्ट में दोषी नहीं ठहराया जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल पुराने मुकदमों के पंजीकरण या आपराधिक इतिहास के आधार पर किसी व्यक्ति को उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एवं समाज विरोधी क्रियाकलाप निवारण अधिनियम, 1986 के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि संगठित आपराधिक गतिविधियों का एक क्रम मौजूद था और आरोपी उसमें साझा उद्देश्य के तहत शामिल थे।
जस्टिस आशीष नैथानी गैंगस्टर एक्ट के तहत दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली आपराधिक अपील पर सुनवाई कर रहे थे। स्पेशल जज नैनीताल ने आरोपियों को धारा 2/3 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी एक गिरोह के सदस्य थे और समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल थे। इसके समर्थन में मुख्य रूप से गैंग चार्ट और पुराने आपराधिक मामलों का हवाला दिया गया।
वहीं आरोपियों की ओर से कहा गया कि दोषसिद्धि केवल गैंग चार्ट और आपराधिक इतिहास के आधार पर की गई, जबकि ऐसा कोई स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य नहीं था जिससे साबित हो कि वे किसी संगठित गिरोह का हिस्सा थे या मिलकर अपराध कर रहे थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि गैंगस्टर एक्ट के तहत दोष सिद्ध करने के लिए गिरोह का अस्तित्व, गैरकानूनी गतिविधियों की निरंतरता और उसमें आरोपियों की भागीदारी साबित करना जरूरी है।
अदालत ने रिकॉर्ड का पुनर्मूल्यांकन करते हुए पाया कि अभियोजन का पूरा मामला मुख्य रूप से गैंग चार्ट और पुराने मामलों पर आधारित था। जिन गवाहों को पेश किया गया, वे ज्यादातर पुलिस अधिकारी थे और उनकी गवाही केवल गैंग चार्ट तैयार करने तथा पुराने मामलों के पंजीकरण तक सीमित थी।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी संगठित गिरोह के सदस्य के रूप में मिलकर काम कर रहे थे या उनके बीच कोई साझा योजना थी।
अदालत ने टिप्पणी की,
“केवल पुराने मुकदमों का दर्ज होना बिना उनके परिणाम बताए या यह साबित किए कि वे संगठित आपराधिक गतिविधियों के क्रम का हिस्सा हैं कानून की आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारियों की गवाही को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वे पुलिसकर्मी हैं लेकिन ऐसी गवाही की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी होती है।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि कई सह-आरोपियों को पहले ही बरी किया जा चुका था और ट्रायल कोर्ट ने यह नहीं बताया कि अपीलकर्ताओं के खिलाफ ऐसा कौन-सा अलग साक्ष्य था, जिसके आधार पर उन्हें दोषी ठहराया गया।
इन्हीं परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में संदेह से परे सफल नहीं हुआ। अदालत ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजा दोनों रद्द कीं।