कब्रिस्तान में दफन अधिकार को लेकर दो मुस्लिम समुदायों का विवाद जनहित याचिका के दायरे में नहीं आता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-05-07 12:15 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि कब्रिस्तान में दफन अधिकार को लेकर दो मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद जनहित याचिका के दायरे में नहीं आता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे अधिकारों को उचित दीवानी कार्यवाही या कानूनन उपलब्ध अन्य माध्यमों से स्थापित किया जा सकता है।

चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ देहरादून के भनियावाला गांव स्थित एक कब्रिस्तान से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही थी।

याचिका में मांग की गई कि बरेलवी समुदाय के लोगों को कब्रिस्तान में शव दफनाने और अंतिम धार्मिक रस्में निभाने से रोका न जाए तथा उन्हें पर्याप्त सुरक्षा दी जाए।

याचिकाकर्ताओं ने प्रतिनिधिक क्षमता में दावा किया था कि उक्त कब्रिस्तान में बरेलवी समुदाय का भी दफन अधिकार है। उनका आरोप था कि दूसरे मुस्लिम समुदाय, यानी देवबंदी समुदाय के लोग, बरेलवी समुदाय को कब्रिस्तान इस्तेमाल नहीं करने दे रहे हैं।

याचिका में यह भी कहा गया कि गांव में बरेलवी समुदाय की संख्या देवबंदी समुदाय की तुलना में अधिक है। इसी आधार पर अदालत से शांतिपूर्ण तरीके से शव दफनाने और अंतिम संस्कार संबंधी रस्में पूरी कराने के लिए निर्देश और सुरक्षा की मांग की गई।

हाईकोर्ट ने कहा,

“एक मुस्लिम समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय के खिलाफ दफन अधिकार का दावा हमारे विचार में जनहित याचिका का विषय नहीं है।”

अदालत ने कहा कि यह विवाद निजी अधिकारों से जुड़ा मामला है, जिसे जनहित याचिका के रूप में नहीं सुना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता और संबंधित समुदाय के सदस्य यदि चाहें तो अपने अधिकार उचित दीवानी मुकदमे या कानून द्वारा उपलब्ध अन्य उपायों के माध्यम से स्थापित कर सकते हैं।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण किया।

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