अपील लंबित रहते नगर निकाय अधिकारी एकतरफा तोड़फोड़ की कार्रवाई नहीं कर सकते: त्रिपुरा हाईकोर्ट
त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कथित अवैध निर्माण के खिलाफ तोड़फोड़ का आदेश जारी होने के बाद यदि उसके विरुद्ध सक्षम अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष वैधानिक अपील लंबित है तो नगर निकाय अधिकारियों को उसी मामले में शिकायत पर विचार कर आगे कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करनी चाहिए।
जस्टिस डॉ. टी. अमरनाथ गौड़ ने कहा कि ऐसी स्थिति में शिकायत पर कार्रवाई करना उचित नहीं है। नगर निकाय अधिकारी शिकायतकर्ता को लंबित अपील के संबंध में अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जाने की सलाह दे सकते थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए और किसी एक पक्ष का समर्थन करते हुए दूसरे पक्ष के लिए परेशानी पैदा नहीं करनी चाहिए।
मामला अगरतला नगर निगम के केंद्रीय क्षेत्र के सहायक नगर आयुक्त के 22 अक्टूबर 2025 के आदेश से जुड़ा था। इस आदेश में याचिकाकर्ता के भवन की दूसरी मंजिल को कथित अवैध निर्माण बताते हुए उसे गिराने का निर्देश दिया गया।
याचिकाकर्ता ने इस आदेश के खिलाफ 29 दिसंबर 2025 को नगर निकाय अपीलीय अधिकरण के समक्ष अपील दायर की थी। इसके साथ तोड़फोड़ की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग भी की गई। अपील पर सुनवाई लंबित रहने के दौरान ही भवन को गिराने की आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने तोड़फोड़ की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग लेकर त्रिपुरा हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब याचिकाकर्ता की वैधानिक अपील नगर निकाय अपीलीय अधिकरण के समक्ष लंबित थी, तब नगर निकाय अधिकारियों को तोड़फोड़ की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ानी चाहिए। कोर्ट के अनुसार, कथित अवैध निर्माण के खिलाफ कोई कार्रवाई करने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए और संबंधित अभिलेखों की जांच कर निष्पक्ष तरीके से निर्णय लिया जाना चाहिए।
जस्टिस अमरनाथ गौड़ ने टिप्पणी की कि अपील लंबित होने के दौरान शिकायत पर कार्रवाई करना अनावश्यक है। उन्होंने कहा कि नगर निकाय अधिकारियों के इस तरह प्रभावी ढंग से काम नहीं करने के कारण नागरिकों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
कोर्ट ने कहा,
“नगर निकाय अधिकारी एक पक्ष का समर्थन करके दूसरे पक्ष के लिए परेशानी पैदा नहीं कर सकते।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नगर निकाय अधिकारियों की प्रशासनिक चूक का खामियाजा नागरिकों को नहीं भुगतना चाहिए। कोर्ट ने नगर निगम आयुक्त को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि अधीनस्थ अधिकारी कानून के अनुसार कार्य करें।