फीस बकाया होने के आधार पर छात्रों के मूल प्रमाणपत्र रोकना अवैध: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि शैक्षणिक संस्थान केवल फीस बकाया होने के आधार पर छात्रों के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र रोक नहीं सकते, क्योंकि ये प्रमाणपत्र छात्र की संपत्ति होते हैं और उन्हें बकाया वसूली के लिए दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुरेपल्ली नंदा की एकल पीठ ने कहा कि विश्वविद्यालय किसी भी बहाने से छात्र के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र (मार्कशीट और डिग्री प्रमाणपत्र सहित) अपने पास नहीं रख सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि फीस बकाया है तो संस्थान को उसकी वसूली के लिए संबंधित सक्षम अदालत में उचित कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए, न कि छात्रों के प्रमाणपत्र रोककर दबाव बनाना चाहिए।
मामले में याचिकाकर्ता भाषापाका प्रज्ञा वर्धिनी ने वर्ष 2024 में महिंद्रा यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में बी.टेक पूरा किया था। 2 अगस्त 2024 को आयोजित दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय ने उन्हें केवल प्रोविजनल सर्टिफिकेट दिया, जबकि कथित फीस बकाया होने का हवाला देते हुए मूल मार्कशीट और डिग्री प्रमाणपत्र रोक लिए।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह अनुसूचित जाति समुदाय से आती हैं और गंभीर आर्थिक कठिनाइयों के कारण तुरंत फीस जमा नहीं कर पाईं। उन्होंने कहा कि मूल प्रमाणपत्र न मिलने के कारण उनकी उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर, भारत और विदेश दोनों जगह प्रभावित हो रहे हैं।
इस कार्रवाई से आहत होकर उन्होंने पहले तेलंगाना राज्य मानवाधिकार आयोग का रुख किया। आयोग ने 3 नवंबर 2025 को विश्वविद्यालय को निर्देश दिया था कि वह तीन दिनों के भीतर याचिकाकर्ता को मूल प्रमाणपत्र, ट्रांसफर सर्टिफिकेट, स्टडी सर्टिफिकेट और कंडक्ट सर्टिफिकेट जारी करे। हालांकि, विश्वविद्यालय ने आयोग के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और उस पर स्टे प्राप्त कर लिया, जिसके कारण प्रमाणपत्र जारी नहीं किए गए।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिट ऑफ मेंडमस की मांग करते हुए याचिका दायर की और कहा कि प्रमाणपत्र रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने तेलंगाना काउंसिल ऑफ हायर एजुकेशन और यूजीसी (UGC) द्वारा जारी दिशानिर्देशों का भी अवलोकन किया। काउंसिल द्वारा 5 अगस्त 2024 को जारी एक संचार में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि विश्वविद्यालय और संबद्ध कॉलेज फीस प्रतिपूर्ति न मिलने के आधार पर छात्रों के मूल प्रमाणपत्र नहीं रोक सकते।
अदालत ने यूजीसी (छात्र शिकायत निवारण) विनियम, 2018 और 23 अप्रैल 2007 के यूजीसी दिशानिर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें संस्थानों को प्रवेश के समय जमा किए गए छात्रों के मूल प्रमाणपत्र रोकने से मना किया गया है।
इसके अलावा, अदालत ने पूर्व के कई न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थान वित्तीय दावों को लागू कराने के लिए छात्रों के प्रमाणपत्र अपने पास नहीं रख सकते। यदि कोई फीस बकाया है तो उसकी वसूली के लिए संस्थान को कानूनी प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
अंततः अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को सभी मूल प्रमाणपत्र तुरंत वापस करे।