संप्रभुता के खिलाफ गतिविधियों के आरोप अहम: तेलंगाना हाइकोर्ट ने उर्दू पत्रकार का पासपोर्ट रद्द करने का फैसला बरकरार रखा

Update: 2026-02-09 08:12 GMT

तेलंगाना हाइकोर्ट ने उर्दू भाषा के पत्रकार द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उनका पासपोर्ट रद्द किए जाने के फैसले को सही ठहराया।

हाइकोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट का नवीनीकरण कोई स्वचालित अधिकार नहीं है और जब किसी व्यक्ति की गतिविधियों को देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए प्रतिकूल बताया गया हो तो अदालत को अत्यंत सावधानी बरतनी होती है।

जस्टिस नागेश भीमपाका ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि सार्वजनिक हित और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के कुछ अपवाद होते हैं और हर परिस्थिति में उनका कठोर अनुप्रयोग आवश्यक नहीं है।

याचिकाकर्ता उर्दू पत्रकार हैं, जो समाचार पत्रों और डिजिटल मीडिया मंचों से जुड़े रहे हैं और जिनके डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लगभग 15 लाख से अधिक सब्सक्राइबर बताए गए हैं। उन्हें वर्ष 2008 में पासपोर्ट जारी किया गया, जिसकी वैधता अगस्त 2018 में समाप्त हो गई। इसके बाद नवीनीकरण के लिए आवेदन करने पर नया पासपोर्ट जारी किया गया।

हालांकि 25 अक्तूबर, 2019 को क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण ने एक पत्र जारी कर याचिकाकर्ता से पासपोर्ट जमा करने को कहा। इसमें बताया गया कि सक्षम प्राधिकारी ने पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10(3)(सी) के प्रावधान के तहत उनका पासपोर्ट रद्द करने का निर्णय लिया। याचिकाकर्ता का दावा था कि यह कदम बिना कोई कारण बताए और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उठाया गया।

मामले में क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण ने अदालत को बताया कि यह कार्रवाई तेलंगाना राज्य के खुफिया विभाग के 17 अक्तूबर, 2019 के एक गोपनीय पत्र के आधार पर की गई। उस पत्र में कहा गया कि याचिकाकर्ता का किसी भी विदेशी देश की यात्रा के लिए पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने का अनुरोध पासपोर्ट अधिनियम की धारा 5(सी)(2) के तहत अस्वीकार किया जा सकता है।

पुलिस की ओर से यह भी जानकारी दी गई कि याचिकाकर्ता भारत से बाहर रहते हुए ऐसी गतिविधियों में संलग्न हो सकता है या होने की आशंका है, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए हानिकारक हों। इसके साथ ही उसकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक व्यक्तिगत फाइल खोले जाने की बात भी कही गई।

पुलिस आयुक्त द्वारा दाखिल जवाब में कहा गया कि याचिकाकर्ता पूर्व में भारतीय दंड संहिता, आर्म्स एक्ट और फॉरेनर्स एक्ट के तहत विभिन्न मामलों में आरोपी रहा है। हालांकि बाद में उसे बरी कर दिया गया। जवाब में यह भी आरोप लगाया गया कि उसने एक पिस्टल और पोटैशियम क्लोराइड मिश्रण छिपाकर रखा था और उसके संबंध आईएसआई से जुड़े एक व्यक्ति मोहम्मद सलीम जुनैद से बताए गए।

इसके अलावा, 2018 में हैदराबाद की अबूबकर मस्जिद से जुड़े सुन्नी-शिया विवाद के दौरान कथित तौर पर उसने अपने समाचार चैनल के माध्यम से एक समुदाय के पक्ष में विचार प्रसारित किए। वर्ष 2019 में भी उसके द्वारा एक वीडियो बनाकर वायरल करने का आरोप लगाया गया, जिसका उद्देश्य एक विशेष वर्ग के लोगों के दिमाग को प्रभावित करना बताया गया। इन सभी आरोपों से याचिकाकर्ता ने इंकार किया।

हाइकोर्ट ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता ने सीधे तौर पर 25.10.2019 के पासपोर्ट रद्द करने के आदेश को चुनौती नहीं दी थी बल्कि उसके बाद जारी एस्पष्टीकरणात्मक पत्र को रद्द करने की मांग की थी।

अदालत ने कहा कि जब मूल रद्दीकरण आदेश को ही चुनौती नहीं दी गई तो याचिकाकर्ता अपने पक्ष में किसी राहत की अपेक्षा नहीं कर सकता।

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का उल्लेख करते हुए कहा कि खुफिया एजेंसियों ने पासपोर्ट प्राधिकरण को सूचित किया कि याचिकाकर्ता राष्ट्र-विरोधी तत्वों या उनके हैंडलरों से संपर्क में आ सकता है और उसकी गतिविधियां भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए हानिकारक हो सकती हैं।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कई आरोपों के संबंध में याचिकाकर्ता की ओर से केवल सामान्य इनकार किया गया।

जस्टिस भीमपाका ने कहा,

“यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पासपोर्ट का नवीनीकरण स्वचालित नहीं होता बल्कि यह नियमों और विनियमों के अधीन है। जब पुलिस द्वारा याचिकाकर्ता की गतिविधियां निगरानी में बताई जा रही हों और गंभीर रूप से यह आरोप हो कि उसकी गतिविधियां देश की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित कर सकती हैं तो इस न्यायालय को अत्यंत सतर्क रहना होगा।”

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन की दलील पर अदालत ने कहा कि जब सार्वजनिक हित, राष्ट्रीय सुरक्षा, गोपनीयता या व्यवहारिक कठिनाइयों का प्रश्न हो तो इन सिद्धांतों का कठोर अनुप्रयोग आवश्यक नहीं होता।

इन सभी कारणों से हाइकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत राहत देना विवेकाधीन है और इस मामले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।

परिणामस्वरूप याचिका खारिज कर दी गई और उर्दू पत्रकार का पासपोर्ट रद्द करने का निर्णय तथा उससे जुड़ा संचार बरकरार रखा गया।

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