न्याय के विफल होने से बचाने के लिए आवश्यक हो तो अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार किया जाना चाहिए: तेलंगाना हाइकोर्ट

Update: 2026-02-25 10:03 GMT

तेलंगाना हाइकोर्ट ने चेक अनादरण मामले में अपीलीय अदालत द्वारा अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करने से इनकार करने का आदेश रद्द किया। हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 391 के तहत अतिरिक्त साक्ष्य लेने की शक्ति तभी प्रयोग की जानी चाहिए जब न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक हो और न्याय के विफल होने की आशंका हो।

जस्टिस तिरुमला देवी ईडा ने आपराधिक याचिका स्वीकार करते हुए 25 जुलाई, 2025 को थर्ड एडिशनल जिला जस्टिस, एल.बी. नगर द्वारा पारित आदेश निरस्त किया।

मामले में वास्तविक शिकायतकर्ता ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 138 के तहत याचिकाकर्ता के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई। वर्ष 2017 में ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया। इसके विरुद्ध दायर अपील वर्तमान में लंबित है।

अपील लंबित रहने के दौरान याचिकाकर्ता ने CrPC की धारा 391 के तहत आवेदन दायर कर कुछ अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी। उनका कहना था कि वर्ष 2012 से 2016 तक फर्म के लेखा अभिलेखों की जांच के दौरान पता चला कि जिस चेक बुक में विवादित चेक शामिल थे, वह गुम थी और उस चेक बुक से विवादित दो चेक के अलावा कोई अन्य चेक उपयोग में नहीं लाया गया। उन्होंने इन दस्तावेजों को अभिलेख पर लेने का आग्रह किया।

अपीलीय अदालत ने 'अशोक त्सेरिंग भूटिया बनाम सिक्किम राज्य' के निर्णय का हवाला देते हुए आवेदन खारिज किया और कहा कि यह याचिकाकर्ता द्वारा कार्यवाही में देरी करने का प्रयास है।

हाइकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेज अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्हें स्वीकार करने से शिकायतकर्ता को कोई हानि नहीं होगी। वहीं प्रतिवादी ने कहा कि अपील वर्ष 2017 से लंबित है और यह आवेदन केवल कार्यवाही लंबी करने के उद्देश्य से दायर किया गया। उनका कहना था कि CrPC की धारा 391 के तहत अतिरिक्त साक्ष्य सीमित परिस्थितियों में ही स्वीकार किया जा सकता है।

हाइकोर्ट ने CrPC की धारा 391 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान अपीलीय अदालत को आवश्यक समझे जाने पर अतिरिक्त साक्ष्य लेने की शक्ति देता है। अदालत ने कहा कि 'अशोक त्सेरिंग भूटिया' मामले में यह कहा गया कि अतिरिक्त साक्ष्य का अर्थ अभियोजन की कमियों को भरना नहीं है और इसे केवल अपवादात्मक परिस्थितियों में ही लिया जा सकता है।

हालांकि, हाइकोर्ट ने 'अजीतसिंह चेहूजी राठौड़ बनाम गुजरात राज्य' तथा 'ब्रिगेडियर सुखजीत सिंह (रिटायर) एमवीसी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई पक्ष समुचित सावधानी बरतने के बावजूद साक्ष्य प्रस्तुत करने से वंचित रह गया हो या कोई तथ्य बाद में प्रकाश में आया हो। ऐसे साक्ष्य को अभिलेख पर न लेने से न्याय के विफल होने की संभावना हो तो CrPC की धारा 391 के तहत शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए।

हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलीय अदालत को प्रस्तावित दस्तावेजों के संबंध में पूर्वानुमान लगाकर प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। विस्तृत विचार के बाद अदालत ने माना कि याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है।

फलस्वरूप 25 जुलाई, 2025 का आदेश निरस्त किया गया और CrPC की धारा 391 के तहत दायर आवेदन स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दे दी गई। लंबित अन्य आवेदन भी निरस्त माने गए।

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