जालसाजी के आरोप में बर्खास्त तेलंगाना कोर्ट कर्मचारी की बहाली, सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त किया बर्खास्तगी आदेश

Update: 2026-02-11 11:26 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (11 फरवरी) को करिमनगर स्थित अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल जज की अदालत में कार्यरत एक ऑफिस सबऑर्डिनेट (अधीनस्थ कर्मचारी) को सेवा में पुनर्बहाली का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि कर्मचारी को सभी परिणामी लाभ, बकाया वेतन और अन्य परिलाभ (emoluments) तीन सप्ताह के भीतर दिए जाएं।

जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट के 12-02-2024 के फैसले को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली। साथ ही 13-11-2018 का बर्खास्तगी आदेश और 8-1-2021 का अपीलीय आदेश भी निरस्त कर दिया।

खंडपीठ ने कहा:

“चूंकि गैर-नियोजन (non-employment) अपीलकर्ता की गलती से नहीं हुआ, इसलिए उसे तत्काल सेवा में बहाल किया जाए और सभी परिणामी लाभ दिए जाएं।”

मामला क्या था?

अपीलकर्ता अगस्त 3 से 7, 2017 तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहे। उन्होंने गंभीर पेट दर्द और तेज बुखार के कारण अवकाश का आवेदन दिया और डॉ. बोम्मारावेनी स्वामी मुदिराज का मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत किया।

जब डॉक्टर को नोटिस भेजा गया तो उन्होंने अदालत में कहा कि उन्होंने ऐसा प्रमाणपत्र जारी नहीं किया और यह फर्जी प्रतीत होता है। इसके बाद विभागीय जांच में जालसाजी और सरकारी कर्मचारी के आचरण के विपरीत व्यवहार के आरोप सिद्ध मानते हुए कर्मचारी को बर्खास्त कर दिया गया।

तेलंगाना हाईकोर्ट ने भी विभागीय जांच को सही ठहराया।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने मूल अभिलेख मंगवाकर हस्तलिखित मेडिकल सर्टिफिकेट, डॉक्टर के हस्ताक्षर और रबर स्टांप का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि—

विवादित मेडिकल सर्टिफिकेट पर लगा रबर स्टांप डॉक्टर द्वारा नोटिस प्राप्ति के समय लगाए गए स्टांप से मिलता-जुलता था।

डॉक्टर के दो निर्विवाद हस्ताक्षर भी आपस में पूरी तरह समान नहीं थे, बल्कि केवल “सामान्य रूप से मिलते-जुलते” थे।

विवादित प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर भी पूरी तरह भिन्न नहीं थे।

अदालत ने कहा कि जब स्थिति स्पष्ट न हो और आरोप गंभीर हो (जैसे जालसाजी, जिसकी सजा अनिवार्य रूप से बर्खास्तगी है), तो जांच अधिकारी को सावधानी बरतनी चाहिए थी और मामले को हस्तलेखन विशेषज्ञ के पास भेजना चाहिए था।

खंडपीठ ने कहा:

“जितना गंभीर आरोप, उतनी ही अधिक सावधानी और कड़ाई से प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।”

अदालत ने माना कि जांच अधिकारी ने बिना पर्याप्त साक्ष्य के डॉक्टर के कथन को स्वीकार कर लिया और हस्ताक्षरों की वैज्ञानिक जांच नहीं कराई। यह निष्कर्ष “विकृत (perverse)” और विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में दिया गया था।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वाद में prima facie यह सिद्ध नहीं हुआ कि मेडिकल प्रमाणपत्र फर्जी था। डॉक्टर ने यह भी स्वीकार किया था कि उन्होंने कर्मचारी का उपचार किया था और लेटरहेड उनका ही था।

इन परिस्थितियों में अदालत ने विभागीय जांच को त्रुटिपूर्ण मानते हुए बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया और कर्मचारी की सेवा में बहाली का आदेश दिया।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब आरोप के परिणामस्वरूप नौकरी और आजीविका पर असर पड़ता हो, तब जांच प्रक्रिया में निष्पक्षता और विधि का सख्ती से पालन अनिवार्य है।

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