बार और बेंच न्याय के रथ के दो पहिए, आपसी टकराव से न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है : सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-12 06:58 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट यतीन ओझा के खिलाफ अवमानना कार्यवाही बंद करते हुए कहा कि बार और बेंच “न्याय के रथ के दो पहिए” हैं और इनके बीच टकराव न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।

जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदूरकर की खंडपीठ ने कहा कि वकालत पेशा और न्यायपालिका न्याय व्यवस्था के दो मूल स्तंभ हैं और दोनों को परस्पर सम्मान व संयम बनाए रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह मामला बार और बेंच के बीच “दुर्भाग्यपूर्ण टकराव” का उदाहरण है।

मामला वर्ष 2020 का है, जब कोविड-19 महामारी के दौरान गुजरात हाईकोर्ट में वर्चुअल सुनवाई और मामलों की लिस्टिंग को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता और गुजरात हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के तत्कालीन अध्यक्ष यतीन ओझा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में हाईकोर्ट और उसकी रजिस्ट्री के खिलाफ तीखी टिप्पणियां की थीं। उन्होंने हाईकोर्ट को “जुए का अड्डा” तक कह दिया था, जिसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार और बेंच का रिश्ता एक ही सिक्के के दो पहलुओं जैसा है, जो एक-दूसरे के पूरक हैं। अदालत ने कहा कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए दोनों का तालमेल बेहद जरूरी है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को कभी-कभी “अभिभावक जैसी” भूमिका अपनानी चाहिए, क्योंकि वकालत का पेशा कई बार अत्यधिक दबाव और जोखिम से भरा होता है। पीठ ने माना कि कोविड महामारी के दौरान युवा वकील गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहे थे और यतीन ओझा पर भी वकीलों की समस्याओं को उठाने का दबाव था।

निर्णय में ओझा के इस्तीफे का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि उस समय कई युवा वकीलों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी और कुछ को जीविका चलाने के लिए फूड डिलीवरी का काम तक करना पड़ा।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ओझा की टिप्पणियां अनुचित थीं और न्यायपालिका की आलोचना “स्कैंडलस आरोपों” तक नहीं पहुंचनी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि संस्थागत व्यवस्थाओं में सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और शिकायतें उचित भाषा में उठाई जा सकती हैं।

अदालत ने कहा कि बार जहां मुकदमेबाजों की निर्भीक आवाज है, वहीं बेंच संविधान का संरक्षक है, जिसका दायित्व कानून की व्याख्या करना, मौलिक अधिकारों की रक्षा करना और निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित करना है।

पीठ ने कहा कि बार और बेंच दोनों की गरिमा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है और किसी एक की छवि धूमिल होने से पूरे न्याय तंत्र की पवित्रता प्रभावित होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जवाबदेही जरूरी है, लेकिन न्यायिक शक्ति का इस्तेमाल दंडात्मक तरीके से नहीं बल्कि सुधारात्मक मार्गदर्शन और संयम के साथ किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था की गरिमा प्रतिशोध से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, साझा जिम्मेदारी और संस्थागत संतुलन से बनी रहती है।

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