कोऑर्डिनेट बेंच दूसरी बेंच द्वारा दी गई ज़मानत रद्द कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच, किसी आरोपी को दूसरी बेंच द्वारा दी गई ज़मानत रद्द कर सकती है, अगर वह ज़मानत गलत तथ्य पेश करके हासिल की गई हो।
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट आरोपी सूरज महानंदा की ज़मानत अर्जी पर सुनवाई कर रहा था। सूरज पर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 21(c) (निर्मित दवाओं और तैयारियों के संबंध में उल्लंघन के लिए सज़ा) और 29 (दुष्प्रेरण और आपराधिक साज़िश के लिए सज़ा) के तहत आरोप लगाए गए हैं। आरोपी ने सह-आरोपी, बाबू चटर्जी के बराबर ज़मानत मांगी थी, जिसे हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच ने ज़मानत दी थी।
अर्जी पर विचार करते समय हाईकोर्ट को बताया गया कि बाबू ने तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया था। उसने कहा था कि लगभग 25 गवाहों की गवाही होनी है, जबकि असल में सिर्फ़ 13 गवाहों की गवाही बाकी थी। यह जानकारी होने के बावजूद, हाईकोर्ट ने बाबू की ज़मानत रद्द करने की अर्जी पर विचार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि एक कोऑर्डिनेट बेंच, दूसरी बेंच द्वारा दी गई ज़मानत रद्द नहीं कर सकती। इसके बावजूद, कोर्ट ने सूरज को ज़मानत देने से मना कर दिया।
जब सूरज ने ज़मानत न मिलने के फ़ैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन दायर की तो जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने सवाल उठाया कि हाईकोर्ट बाबू की ज़मानत रद्द क्यों नहीं कर सकता। हालांकि, बेंच ने बाबू की ज़मानत रद्द नहीं की।
"हमारी समझ से बाहर है कि हाईकोर्ट ऐसा क्यों कह रहा है कि एक कोऑर्डिनेट बेंच, किसी सह-आरोपी को दी गई ज़मानत रद्द नहीं कर सकती। अगर हाईकोर्ट के सामने गलत तथ्य पेश करके ज़मानत हासिल की गई है तो कोर्ट हमेशा उस मामले पर विचार कर सकता है और उचित आदेश दे सकता है।"
हालांकि, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि सूरज 1 साल और 10 महीने से ज़्यादा समय से हिरासत में है और अभी तक सिर्फ़ 1 गवाह की गवाही हुई है, कोर्ट ने उसे ज़मानत दी। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह भी निर्देश दिया कि वह ट्रायल की प्रक्रिया में तेज़ी लाए।
Case Details: SURAJ MAHANANDA v. STATE OF WEST BENGAL|Petition(s) for Special Leave to Appeal (Crl.) No(s).9148-9149/2026