महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाएं अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार से जुड़ीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-06-19 08:17 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि अदालत परिसरों में महिला अधिवक्ताओं के लिए स्वच्छ शौचालय, लेडीज़ बार रूम और अन्य बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार से सीधे जुड़ी हुई है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ महिला अधिवक्ताओं द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें देशभर की अदालतों में लेडीज़ बार रूम और अन्य आवश्यक सुविधाओं के अभाव का मुद्दा उठाया गया है।

अदालत ने कहा कि जब महिला वकील अपने दिन का बड़ा हिस्सा अदालत परिसरों में बिताती हैं, तब उनकी सुविधा, गोपनीयता, सुरक्षा और पेशेवर कार्यों के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं बल्कि गरिमा और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न है।

याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए देशव्यापी सर्वेक्षण में सामने आया कि अधिकांश जिला, तहसील और उच्च न्यायालय परिसरों में या तो लेडीज़ बार रूम नहीं हैं या उपलब्ध सुविधाएं बेहद अपर्याप्त हैं। सर्वेक्षण में बैठने की व्यवस्था, स्वच्छ शौचालय, चेंजिंग रूम और नर्सिंग सुविधाओं की कमी उजागर हुई।

सुनवाई के दौरान की सीनियर एडवोकेट डॉ. मोनिका गुसैन ने बताया कि गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा जैसे बड़े शहरों में भी महिला अधिवक्ताओं के लिए समुचित बार रूम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि सुविधाओं के अभाव से महिलाओं को यह महसूस कराया जाता है मानो वे अदालत परिसरों में मौजूद रहने के लिए नहीं हैं।

चीफ़ जस्टिस ने याचिकाकर्ताओं द्वारा किए गए शोध और डेटा संग्रह की सराहना की तथा बताया कि न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए उन्होंने एक समिति का गठन किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने युवा वकीलों के लिए एक विशेष सहायता कोष बनाने के प्रस्ताव का भी समर्थन किया और मामले में अटॉर्नी जनरल तथा राज्यों के एडवोकेट जनरल्स से जवाब मांगा है।

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