SC ने जनजातीय आयकर छूट में 'क्रीमी लेयर' लागू करने की मांग पर सुनवाई से किया इनकार, संसद से संपर्क करने को कहा

Update: 2026-06-18 07:06 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजातियों (ST) को आयकर अधिनियम, 2025 के तहत मिलने वाली आयकर छूट में "क्रीमी लेयर" व्यवस्था लागू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा विधायी और नीतिगत निर्णयों से जुड़ा है, इसलिए इसके लिए संसद और संबंधित संसदीय समिति से संपर्क किया जाना चाहिए।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए उन्हें संसदीय याचिका समिति और केंद्र सरकार के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की स्वतंत्रता प्रदान की।

अदालत ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत कानून या सार्वजनिक नीति में संशोधन से संबंधित है और इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट इसके लिए उपयुक्त मंच नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की, "आपकी बात पूरी तरह सही हो सकती है, लेकिन आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं। संसद के पास जाइए।"

याचिका में आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 11 तथा अनुसूची-III के क्रमांक 19 को चुनौती दी गई थी। यह प्रावधान छठी अनुसूची के क्षेत्रों और अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड तथा त्रिपुरा में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की कुछ आय को आयकर से छूट देता है।

उपाध्याय ने तर्क दिया कि वर्तमान व्यवस्था अमीर और गरीब सभी जनजातीय व्यक्तियों को समान कर छूट देती है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 27 का उल्लंघन होता है। उन्होंने कहा कि बड़े व्यवसाय, अस्पताल, होटल और शिक्षण संस्थान चलाने वाले करोड़पति एवं अरबपति भी इस छूट का लाभ उठा रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि वर्षों में जनजातीय समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है, इसलिए बिना किसी आय सीमा या क्रीमी लेयर व्यवस्था के दी जा रही कर छूट अब मनमानी हो गई है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा कर छूट का दुरुपयोग किया जा रहा है तो उसके खिलाफ अलग से कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन केवल दुरुपयोग के आधार पर वास्तविक और पात्र लाभार्थियों को लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।

मामले का निपटारा करते हुए अदालत ने कहा कि यह विषय पूरी तरह से विधायी नीति से जुड़ा है और इस पर फैसला लेने का अधिकार संसद के पास है। साथ ही, याचिकाकर्ता को संसद की याचिका समिति, केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों के समक्ष अपनी मांग रखने की छूट दी गई।

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