ट्रांसजेंडर संशोधन 2026 पहले से मिले अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट, केंद्र से जवाब मांगा

Update: 2026-08-03 11:44 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम' में 2026 के संशोधन के असर पर विचार करे। यह उन लोगों के लिए है, जो सेक्स रीअसाइनमेंट थेरेपी (जेंडर बदलने की प्रक्रिया) के बीच में हैं या जिन्हें पहले ही ट्रांसजेंडर कार्ड मिल चुके हैं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहले से मिले अधिकारों में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के यह कहने के बाद कि वह इन मुद्दों की जांच करेंगे, बेंच ने इस बारे में कोई आदेश पारित नहीं किया।

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से सीनियर एडवोकेट जयना कोठारी ने पुरजोर आग्रह किया कि जिन लोगों को पहले ही ट्रांसजेंडर कार्ड जारी किए जा चुके हैं, उनके लिए 'यथास्थिति' (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया जाए। उन्होंने कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए बना नेशनल पोर्टल, जिस पर लोगों को नए आईडी कार्ड के लिए आवेदन करना होता है, अब काम नहीं कर रहा है।

उन्होंने कहा,

"जिन लोगों को पहले ही TG कार्ड मिल चुका है, उनके फायदे बंद नहीं किए जा सकते।"

सॉलिसिटर ने कहा कि नए संशोधन ने 'सेल्फ-असेसमेंट' (खुद से अपनी पहचान तय करने) के कॉन्सेप्ट को खत्म कर दिया, क्योंकि इससे दिक्कतें हो रही थीं।

एसजी ने कहा,

"मान लीजिए कि मैं बायोलॉजिकल रूप से पुरुष हूं, और मुझे लगता है कि मैं महिला हूं और TG कार्ड ले लेता हूं, और मान लीजिए कि मैं महिलाओं का टॉयलेट इस्तेमाल करने लगता हूं... ऐसा हो रहा है।"

हालांकि, जस्टिस बागची ने कहा कि 2026 का संशोधन भविष्य के लिए लागू होने वाला कानून (Prospective Law) है और यह उन अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता, जो पहले ही दिए जा चुके हैं। अगर उन्हें खत्म करना है, तो संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाना चाहिए।

जस्टिस बागची ने कहा,

"हम इन चिंताओं से वाकिफ हैं। अगर विधायिका को लगता कि यह ऐसी स्थिति है, जिसमें स्पष्टीकरण वाले संशोधन की जरूरत है, तो वह संशोधन या नए कानून में पहले से दिए गए अधिकारों को खत्म करने के लिए 'निरसन' (Repeal) का प्रावधान करती। ऐसा न करने और भविष्य के लिए कानून होने के नाते, ट्रांसजेंडर अधिकारों के रूप में जो अधिकार मिले हैं, वे बने रहेंगे। और जब भी मामला धोखाधड़ी का हो, तो उन्हें नोटिस दिया जाना चाहिए और उसके बाद उसे रद्द किया जाना चाहिए।"

SG ने कहा कि सेल्फ-असेसमेंट से जटिलताएं पैदा हो रही हैं।

उन्होंने कहा,

"मान लीजिए कि जन्म से पुरुष लेकिन महिला के तौर पर पहचान रखने वाले किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है; तो क्या उत्तराधिकार हिंदू पुरुष के लिए बिना वसीयत मरने पर लागू होने वाले कानून के तहत तय होगा या महिला के लिए लागू कानून के तहत? ये कुछ मुद्दे हैं।"

सीनियर वकील अरुंधति काटजू ने कहा कि नए संशोधन से कई लोगों की पहचान को लेकर अनिश्चितता पैदा हो जाएगी और उन्होंने कोर्ट से उनकी सुरक्षा के लिए अंतरिम आदेश जारी करने का अनुरोध किया।

काटजू ने कहा,

"ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने पासपोर्ट और आधार कार्ड बदलवा लिए हैं। जिस व्यक्ति की स्थिति बदल गई और अगर वह नया पासपोर्ट लेने के बाद किसी देश की यात्रा करना चाहता है तो अचानक वह अधर में लटक जाता है।"

बेंच ने कहा कि ऐसी मुश्किलों का सामना कर रहे लोगों के खास मामलों को कोर्ट के ध्यान में लाया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि डॉक्टर 2026 के संशोधन के बाद लोगों के लिए हार्मोन थेरेपी जारी रखने को लेकर आशंकित थे। उन्होंने बताया कि हाई कोर्ट ने कुछ मामलों में अंतरिम आदेश पारित किए।

SG ने कोर्ट से जवाब देने के लिए समय मांगा।

SG ने कहा,

"यह कोई ज़रूरी मामला नहीं है। यह राशन कार्ड जैसा नहीं है जहाँ आपको खाना नहीं मिल रहा हो। मुझे इसकी जल्दबाज़ी समझ नहीं आ रही है।"

याचिकाकर्ताओं ने SG की बात का विरोध करते हुए कहा कि कई लोगों का इलाज बाधित हुआ है। मद्रास हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली ट्रांसजेंडर वकील कनमनी ने कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति के लिए TG कार्ड उतना ही ज़रूरी है जितना राशन कार्ड।

बेंच ने भरोसा दिलाया कि अगर किसी व्यक्ति को ऐसी कोई मुश्किल आ रही है तो अर्ज़ी दाखिल की जा सकती है। बेंच ने सामान्य आदेश पारित करने में हिचकिचाहट जताई और कहा कि तथ्यों के आधार पर व्यक्तिगत राहत दी जा सकती है। SG ने कोर्ट से अपील की कि "सिर्फ़ ज़ुबानी दावों के आधार पर पहले से कोई आदेश" पारित न किया जाए।

आखिरकार बेंच ने मामलों को 17 अगस्त के लिए सूचीबद्ध किया।

कोर्ट ने मई में याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। बाद में केंद्र ने हाई कोर्ट में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की ट्रांसफर याचिकाओं पर नोटिस जारी करते हुए हाई कोर्ट में कार्यवाही पर रोक लगाई है।

T.P.(C) No. 1686-1692/2026 UNION OF INDIA Vs NAI BHOR SANSTHA, LAXMI NARAYAN TRIPATHI AND ANR. v UNION OF INDIA W.P.(C) No. 548/2026 and connected cases

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