ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटकर सेशंस कोर्ट दोषसिद्धि दे तो हाईकोर्ट में अपील नहीं, केवल रिवीजन ही उपाय: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि सेशंस कोर्ट अपीलीय अधिकार का प्रयोग करते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को पलटकर किसी आरोपी को दोषी ठहराता है, तो उसके खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 374 (अब BNSS की धारा 415) के तहत हाईकोर्ट में वैधानिक अपील दायर नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में आरोपी के पास केवल रिवीजन याचिका दाखिल करने का ही उपाय उपलब्ध होगा।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने कहा कि धारा 374 केवल उस अदालत के फैसले पर लागू होती है जिसने स्वयं मुकदमे (Trial) की सुनवाई की हो। सेशंस कोर्ट जब अपीलीय अधिकार का प्रयोग करते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को पलटता है, तो वह ट्रायल कोर्ट के रूप में कार्य नहीं कर रहा होता। इसलिए उसके आदेश के खिलाफ धारा 374 के तहत दूसरी अपील का कोई प्रावधान नहीं है।
मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) ने आरोपी को बरी कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने सेशंस कोर्ट में अपील दायर की, जहां बरी करने का आदेश पलटते हुए आरोपी को पहली बार दोषी ठहराया गया। आरोपी ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में धारा 374 CrPC के तहत अपील दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने सुनवाई योग्य (Maintainable) न मानते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि अपील "ट्रायल की निरंतरता" (continuation of trial) अवश्य है, लेकिन इससे अपीलीय अदालत ट्रायल कोर्ट नहीं बन जाती। अदालत ने यह भी कहा कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का Arun Sharma v. State of Himachal Pradesh (2019) का फैसला सही कानून नहीं है, क्योंकि उसमें इस सिद्धांत का गलत विस्तार किया गया था।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए आरोपी को सेशंस कोर्ट के दोषसिद्धि आदेश के खिलाफ रिवीजन याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की।