सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में दो आरोपियों को दी गई जमानत रद्द करते हुए कहा कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत देते समय अदालत को अपने फैसले में प्रथम दृष्टया जमानत देने के स्पष्ट और न्यायसंगत कारण दर्ज करने चाहिए। केवल औपचारिक तरीके से जमानत देना न्यायिक विवेक का उचित इस्तेमाल नहीं माना जा सकता।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ महाराष्ट्र सरकार की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दो आरोपियों को दी गई जमानत को चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट और निचली अदालत ने आरोपियों के खिलाफ मौजूद महत्वपूर्ण परिस्थितियों और प्रथम दृष्टया साक्ष्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

पीठ ने 2004 के कल्याण चंद्र सरकार बनाम राजेश रंजन फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जमानत देते समय अदालत को मामले के साक्ष्यों की विस्तृत जांच करने की जरूरत नहीं होती लेकिन गंभीर अपराध में जमानत देने के लिए प्रथम दृष्टया संतुष्ट होने के कारण आदेश में दर्ज करना जरूरी है। ऐसे कारणों के अभाव में आदेश को न्यायिक विवेक का इस्तेमाल न करने वाला माना जा सकता है।

कोर्ट ने कहा,

“हत्या जैसे गंभीर अपराधों में जमानत देने के आदेश में मामले के तथ्यों पर उचित विचार और जमानत देने के न्यायसंगत कारण दर्ज होने चाहिए।”

मामला एक व्यक्ति की हत्या से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार घटना वाली रात करीब 10 बजकर 22 मिनट पर मृतक की पत्नी ने उसे फोन कर बताया कि चार लोग उनके घर पहुंचे हैं। इनमें एक आरोपी और तीन अन्य व्यक्ति शामिल थे। वे उसके बेटे प्रज्वल से उसकी शादी के दौरान हुए विवाद को लेकर माफी मांगने की मांग कर रहे थे।

आरोप था कि चारों लोगों ने घर का दरवाजा जोर-जोर से पीटा और परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। मृतक जब घर पहुंचा तो आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी।

इसके बाद मुख्य आरोपी ने वाहन से पेट्रोल का डिब्बा निकाला। आरोप है कि तीन अन्य आरोपियों ने मृतक को पकड़कर रखा और मुख्य आरोपी ने उसके शरीर पर पेट्रोल डालकर माचिस से आग लगा दी। गंभीर रूप से झुलसे व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसकी मौत हो गई।

मामले में आरोपी नंबर चार को जमानत मिलने के बाद समानता के आधार पर आरोपी नंबर तीन को भी जमानत दी गई। हाईकोर्ट ने इन आदेशों को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट और निचली अदालत ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि घटना से पहले चारों आरोपी लगातार शिकायतकर्ता के घर पर हमला कर रहे थे और परिवार को धमकी दे रहे थे कि यदि प्रज्वल ने माफी नहीं मांगी तो वे उन्हें नहीं छोड़ेंगे।

पीठ ने कहा कि आरोपियों का पहले से गंभीर अपराध के लिए तैयार होकर आना प्रथम दृष्टया इस तथ्य से भी सामने आता है कि चारों जिस वाहन से घटनास्थल पहुंचे थे उसमें पेट्रोल का डिब्बा मौजूद था।

कोर्ट ने कहा कि घटना का समय, आरोपियों की पूर्व तैयारी और लगातार दी गई धमकियों को एक साथ देखने पर यह गंभीर और महत्वपूर्ण परिस्थितियां बनती हैं। ये परिस्थितियां प्रथम दृष्टया उस हमले की पूर्व नियोजित प्रकृति की ओर इशारा करती हैं, जिसमें ज्वलनशील पदार्थ डालकर एक व्यक्ति को जिंदा जला दिया गया।

पीठ ने यह भी कहा कि जमानत पर विचार करते समय अपराध की गंभीरता और उसके प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने शबीन अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सहित पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत देने के कारणों को कमजोर और कानून की कसौटी पर टिकने योग्य नहीं माना। पीठ ने दोनों आरोपियों को दी गई जमानत रद्द की।

कोर्ट ने आरोपी ज्योतिरादित्य अजित सिंह जाधव को हाईकोर्ट द्वारा 12 नवंबर 2025 को दी गई जमानत और आरोपी पृथ्वीराज राजेंद्र शिंदे को निचली अदालत द्वारा 13 जनवरी 2026 को दी गई जमानत के आदेश रद्द कर दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। ऐसा नहीं करने पर निचली अदालत को उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमे के लिए पेश कराने के उचित कदम उठाने का निर्देश दिया गया।

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