Electricity Act | दो साल बाद बिजली बकाया वसूलना तभी संभव, जब हर बिल में लगातार बकाया दिखाया गया हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बिजली के पुराने बकाये की वसूली को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि सामान्य तौर पर बिजली की खपत से जुड़ी कोई रकम दो साल के भीतर वसूल की जानी चाहिए। दो साल की अवधि के बाद भी बकाया वसूलना है तो उस रकम को लगातार बिजली बिलों में बकाया के तौर पर दिखाया जाना जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर दो साल से अधिक पुरानी रकम की वसूली पर रोक रहेगी।
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश की बिजली वितरण कंपनी दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। कंपनी ने उपभोक्ता से फरवरी 1998 से सितंबर 1998 के बीच के न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क के तौर पर 57,74,164 रुपये की मांग की थी।
मामला अतिरिक्त 2000 केवीए भार से जुड़ा था। उपभोक्ता को पहले 2000 केवीए भार की आपूर्ति की जा रही थी। बाद में कंपनी ने अतिरिक्त 2000 केवीए भार देने की पेशकश की, लेकिन उपभोक्ता ने इस अतिरिक्त भार में रुचि नहीं दिखाई और उसका इस्तेमाल भी नहीं किया।
इसके बावजूद बिजली कंपनी ने करीब नौ साल बाद 13 फरवरी 2007 को फरवरी 1998 से सितंबर 1998 की अवधि के लिए 57.74 लाख रुपये की मांग की। उपभोक्ता ने इस मांग को बिजली लोकपाल के समक्ष चुनौती दी। लोकपाल ने बिजली अधिनियम की धारा 56(2) का हवाला देते हुए मांग रद्द की।
इसके बाद बिजली कंपनी ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने भी लोकपाल का आदेश बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने कहा कि अतिरिक्त 2000 केवीए भार का उपभोक्ता ने कभी इस्तेमाल नहीं किया और संबंधित रकम को 1998 से 2007 तक लगातार बकाये के रूप में नहीं दिखाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार किया। खंडपीठ ने बिजली अधिनियम की धारा 56(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी उपभोक्ता से बकाया रकम दो साल की अवधि के बाद तभी वसूल की जा सकती है, जब उसे लगातार बिजली शुल्क के बकाये के रूप में दर्शाया गया हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल यह दावा कर देना पर्याप्त नहीं है कि रकम पहले से बकाया थी। बिजली कंपनी को अपने नियमित बिलों में उस रकम को लगातार बकाये के तौर पर दिखाना होगा।
खंडपीठ ने कहा कि 1998 की अवधि से संबंधित रकम की पहली मांग 13 फरवरी 2007 को की गई। चूंकि इस बीच संबंधित रकम को लगातार बकाये के रूप में नहीं दिखाया गया, इसलिए मांग दो साल की सीमा से बाहर हो चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केसी निनान बनाम केरल राज्य विद्युत बोर्ड और सहायक अभियंता बनाम रहमतुल्लाह खान के फैसलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों में भी बिजली अधिनियम की धारा 56(2) के तहत पुराने बकाये की वसूली की सीमा को स्पष्ट किया गया।
अंततः सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की अपील खारिज की और 1998 के बकाये के लिए 2007 में की गई 57.74 लाख रुपये की मांग को समय-सीमा से बाधित माना।