सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि वादी द्वारा देय कोर्ट फीस इस बात पर निर्भर करती है कि संपत्ति पर उसका कब्जा है या नहीं और मामले के अन्य तथ्य विवादित हैं तो केवल पर्याप्त कोर्ट फीस नहीं देने के आधार पर वादपत्र को शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें संयुक्त स्वामित्व की घोषणा की मांग वाले वाद को अधिक मूल्य आधारित कोर्ट फीस नहीं देने के आधार पर शुरुआत में ही खारिज कर दिया गया।

मामला पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। वादियों का दावा था कि वे अपनी दादी से विरासत में मिली संपत्ति में प्रतिवादियों के साथ संयुक्त कब्जे में हैं और संपत्ति में उनका संयुक्त स्वामित्व है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दूसरे प्रतिवादी की मिलीभगत से संपत्ति को किसी तीसरे व्यक्ति के पक्ष में बेचने के लिए फर्जी सेल डीड तैयार किया गया।

वादियों ने इस मामले में निश्चित कोर्ट फीस जमा की थी। दूसरे प्रतिवादी ने दलील दी कि संयुक्त स्वामित्व की घोषणा की मांग होने के कारण वादियों को संपत्ति के मूल्य के आधार पर अधिक मूल्य वाली कोर्ट फीस देनी चाहिए। उसने इसी आधार पर दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत वादपत्र खारिज करने की मांग की।

निचली अदालत ने यह आवेदन खारिज कर दिया था। हालांकि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रतिवादी की अपील स्वीकार करते हुए माना कि वादियों को अधिक मूल्य आधारित कोर्ट फीस देनी होगी। इसके बाद वादी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि आदेश 7 नियम 11 के तहत वादपत्र खारिज करने के सवाल पर अदालत को मुख्य रूप से वादपत्र में किए गए कथनों को देखना होता है। प्रतिवादी द्वारा अपने आवेदन के समर्थन में पेश की गई सामग्री के आधार पर विवादित तथ्यों का फैसला इस स्तर पर नहीं किया जा सकता।

जस्टिस अंजारिया द्वारा लिखे गए फैसले में पीठ ने कहा कि पहली नजर में ऐसा कोई आधार नहीं था, जिसके चलते आदेश 7 नियम 11 के तहत वादपत्र को शुरुआती स्तर पर ही खारिज किया जाता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संयुक्त स्वामित्व की घोषणा के लिए देय कोर्ट फीस का सवाल केवल वादपत्र पढ़कर तय नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह संपत्ति पर कब्जे की स्थिति, सेल्स डीड और मामले से जुड़े अन्य तथ्यों पर निर्भर करता है।

पीठ ने कहा,

“कोर्ट फीस का सवाल अलग से देखा जाना होगा, क्योंकि यह केवल कब्जे या मांगी गई राहत पर ही नहीं बल्कि सेल डीड और मामले से जुड़े अन्य तथ्यों पर भी निर्भर करेगा। इन सवालों का फैसला साक्ष्य के आधार पर किया जाना है।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्या वादी को अधिक मूल्य आधारित कोर्ट फीस देनी है या निश्चित कोर्ट फीस पर्याप्त है, यह सवाल मुकदमे में साक्ष्य पेश होने के बाद ही तय किया जा सकता है।

पीठ ने वर्ष 2010 के सुप्रीम कोर्ट के सुहृद सिंह उर्फ सरदूल सिंह बनाम रणधीर सिंह मामले का भी हवाला दिया।

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में वादी उस कथित सेल डीड के पक्षकार नहीं थे, जो प्रतिवादियों ने किसी तीसरे व्यक्ति के पक्ष में किया। इसलिए केवल अधिक मूल्य आधारित कोर्ट फीस नहीं देने के आधार पर उनका मुकदमा समाप्त नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और निचली अदालत के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें वादपत्र खारिज करने की प्रतिवादी की मांग ठुकराई गई।

हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के दौरान पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट फीस से जुड़ा सवाल बाद में तय किया जा सकेगा। यानी अभी वादपत्र को इस आधार पर खारिज नहीं किया जाएगा लेकिन मुकदमे में तथ्य स्पष्ट होने के बाद अदालत यह तय कर सकती है कि वादी द्वारा दी गई कोर्ट फीस पर्याप्त है या नहीं।

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