भारत में लेन ड्राइविंग का कोई कॉन्सेप्ट नहीं : सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सड़क सुरक्षा से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान देश में लेन ड्राइविंग की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में “लेन ड्राइविंग जैसी कोई अवधारणा ही नहीं है” और सड़क हादसों की बड़ी वजह यही है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच सड़क सुरक्षा से जुड़े मामले S Rajaseekaran v. Union of India की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कोर्ट समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करता रहा है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने कहा, “इस देश में यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि लोग लेन में गाड़ी चलाएं? यहां लेन ड्राइविंग का कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है। अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं इसी कारण होती हैं।”
उन्होंने केंद्र सरकार से कहा कि लेन ड्राइविंग को बढ़ावा देने पर गंभीरता से काम किया जाए, क्योंकि इससे सड़क हादसों में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सार्वजनिक सेवा वाहनों में Vehicle Location Tracking Devices (VLTD) और पैनिक बटन लगाने के नियमों के पालन पर भी चिंता जताई। अदालत ने नोट किया कि केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 125H के तहत यह व्यवस्था अनिवार्य होने के बावजूद देश में 1% से भी कम परिवहन वाहनों में ये डिवाइस लगे हैं।
कोर्ट ने इसे “बेहद चिंताजनक” बताते हुए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे नए और पुराने सभी सार्वजनिक वाहनों में ट्रैकिंग डिवाइस और इमरजेंसी पैनिक बटन समयबद्ध तरीके से लगाना सुनिश्चित करें।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जब तक किसी वाहन में ट्रैकिंग डिवाइस और पैनिक बटन लगे होने की पुष्टि “वाहन” (Vahan) पोर्टल पर दर्ज नहीं होती, तब तक उसे फिटनेस सर्टिफिकेट या परमिट जारी न किया जाए।
कोर्ट ने 21 दिसंबर 2018 तक पंजीकृत पुराने वाहनों में भी इन उपकरणों को रेट्रोफिट करने और निगरानी प्रणाली को वाहन डेटाबेस से जोड़ने के निर्देश दिए, ताकि रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव हो सके।
इसके अलावा स्पीड लिमिटिंग डिवाइस को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की उदासीनता पर नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद अधिकांश राज्यों ने अनुपालन रिपोर्ट दाखिल नहीं की है। कोर्ट ने राज्यों को “वाहन” और “परिवहन” पोर्टल के आंकड़ों के साथ नई विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड के अब तक गठन न होने पर भी असंतोष व्यक्त किया। कोर्ट ने याद दिलाया कि 4 मई 2025 को केंद्र सरकार को छह महीने का समय दिया गया था, लेकिन अब तक बोर्ड का गठन नहीं हुआ। अदालत ने इसे “अंतिम अवसर” बताते हुए तीन महीने के भीतर बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया।
वहीं उत्तर प्रदेश के उस कानून पर भी सुनवाई हुई, जिसके तहत एक निश्चित तारीख से पहले मोटर वाहन अधिनियम के तहत कई मुकदमे स्वतः समाप्त हो गए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि कितने मामलों को दोबारा शुरू किया जाएगा और उसकी प्रक्रिया क्या होगी।