सुप्रीम कोर्ट: मूल विक्रेता की सहमति के बिना रेक्टिफिकेशन डीड से संपत्ति नहीं बदली जा सकती

Update: 2026-07-15 11:28 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि रेक्टिफिकेशन डीड (Rectification Deed) का इस्तेमाल किसी बिक्री विलेख (Sale Deed) में केवल त्रुटि सुधारने के लिए किया जा सकता है, न कि संपत्ति की पहचान ही बदलने के लिए। अदालत ने कहा कि यदि मूल विक्रेता (Original Transferor) इसकी प्रक्रिया में शामिल नहीं है, तो रेक्टिफिकेशन डीड के जरिए दूसरी संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने यह भी कहा कि अदालतें ऐसे आधार पर फैसला नहीं दे सकतीं, जो पक्षकारों ने कभी अपने तर्कों में उठाए ही न हों।

मामला कर्नाटक की एक भूमि से जुड़ा था। वर्ष 1971 में थिम्मादासप्पा ने सर्वे नंबर 1/4 की जमीन बेची थी, जो बाद में कई हाथों से गुजरते हुए वर्ष 1973 में वादी के.एम. वेंकटमुनियप्पा के पास पहुंची। दूसरी ओर, वर्ष 1982 में सरकार ने थिम्मादासप्पा को सर्वे नंबर 162 की एक अलग भूमि पुनः आवंटित (Re-grant) की।

इसके बाद वर्ष 1997 में वादी और उसके विक्रेता ने एक रेक्टिफिकेशन डीड निष्पादित कर दावा किया कि वर्ष 1973 की बिक्री विलेख में सर्वे नंबर गलती से 1/4 लिखा गया था, जबकि सही सर्वे नंबर 162 होना चाहिए था। हालांकि, इस रेक्टिफिकेशन डीड में मूल मालिक थिम्मादासप्पा पक्षकार नहीं थे।

बाद में वर्ष 2005 में थिम्मादासप्पा ने सर्वे नंबर 162 का अपने बेटों के बीच बंटवारा कर दिया। वादी ने इस बंटवारे को चुनौती देते हुए दावा किया कि सर्वे नंबर 162 का वास्तविक मालिक वही है।

ट्रायल कोर्ट ने वादी का दावा खारिज कर दिया, लेकिन प्रथम अपीलीय अदालत और उसके बाद हाईकोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला दिया। इसके खिलाफ थिम्मादासप्पा के बेटों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसलों को पलटते हुए कहा कि 'Nemo Dat Quod Non Habet' का सिद्धांत लागू होगा, अर्थात "कोई व्यक्ति उससे बेहतर अधिकार हस्तांतरित नहीं कर सकता, जितना अधिकार स्वयं उसके पास है।"

अदालत ने कहा कि जब मूल मालिक ने कभी सर्वे नंबर 162 बेचा ही नहीं, तो बाद के खरीदारों को भी उस पर कोई वैध स्वामित्व नहीं मिल सकता। केवल रेक्टिफिकेशन डीड के जरिए दूसरी संपत्ति को बिक्री विलेख का विषय नहीं बनाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि स्वामित्व की घोषणा (Declaration of Title) मांगने वाले वादी को अपना दावा स्वयं मजबूत साक्ष्यों से साबित करना होता है। वह प्रतिवादी के मामले की कमजोरी के आधार पर सफल नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी गौर किया कि 1997 की रेक्टिफिकेशन डीड के बाद भी वादी ने लगभग दस वर्षों तक राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) में अपना नाम दर्ज कराने का कोई प्रयास नहीं किया।

इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया, हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और अपील स्वीकार कर ली।

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