दलित-आदिवासी आरोपियों से थाने साफ करवाने की जमानत शर्तें 'अमानवीय', सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ओडिशा की अदालतों द्वारा जमानत देते समय लगाई गई उन शर्तों पर कड़ी आपत्ति जताई, जिनमें दलित और आदिवासी आरोपियों को दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने इन शर्तों को “आपत्तिजनक (obnoxious)” और जातिगत पक्षपात से प्रेरित बताया।
चीफ़ जस्टिस और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह की शर्तें न केवल अपमानजनक और अमानवीय हैं, बल्कि मानवाधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन भी हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी शर्तें न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के बजाय आरोपी की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं और उसे पहले से दोषी मानने की धारणा पर आधारित हैं, जो कानूनन अस्वीकार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने इन जमानत शर्तों को “शून्य और निरस्त (null and void)” घोषित करते हुए देशभर की सभी अदालतों को भविष्य में ऐसी शर्तें न लगाने का निर्देश दिया। साथ ही आदेश की प्रति सभी हाई कोर्ट्स को भेजने का निर्देश भी दिया गया।
अदालत ने कहा कि इस तरह की शर्तें यह संकेत देती हैं कि न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह मौजूद हो सकता है, खासकर तब जब ऐसी शर्तें केवल हाशिए पर खड़े समुदायों—दलितों और आदिवासियों—पर ही लागू की गईं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि ये आदेश अनजाने में भी दिए गए हों, तब भी उनकी प्रकृति इतनी अपमानजनक और क्रूर है कि इससे न्यायपालिका की छवि पर गंभीर सवाल उठते हैं।
संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 17 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि समानता का अधिकार और अस्पृश्यता का उन्मूलन भारतीय संविधान की मूल भावना है, और न्यायपालिका का कर्तव्य है कि वह इन मूल्यों की रक्षा करे, विशेषकर समाज के कमजोर वर्गों के लिए।
चीफ़ जस्टिस ने ओडिशा के महाधिवक्ता से कहा कि इस तरह की शर्तें न्यायपालिका की साख को नुकसान पहुंचाती हैं और 2026 में किसी भी अदालत द्वारा ऐसी शर्तें लगाना पूरी तरह अस्वीकार्य है।
यह मामला एक स्वत: संज्ञान (suo motu) याचिका के रूप में सामने आया, जिसमें मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर बताया गया कि ओडिशा में एंटी-माइनिंग विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में आरोपियों—जो अधिकतर दलित और आदिवासी समुदाय से थे—पर इस तरह की शर्तें लगाई गई थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच ऐसे कम से कम आठ मामले सामने आए, जिनमें से सात रायगढ़ा जिले की अदालतों और एक उड़ीसा हाईकोर्ट द्वारा पारित किया गया था। एक मामले में आरोपी को हर दिन सुबह 6 से 9 बजे तक दो महीने तक पुलिस स्टेशन की सफाई करने का आदेश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि न्यायपालिका का दायित्व है कि वह संविधान के मूल्यों की रक्षा करे और समाज के सबसे कमजोर वर्गों की गरिमा सुनिश्चित करे।