NEET-PG कट ऑफ में कमी से डॉक्टरों की योग्यता प्रभावित नहीं होगी: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा

Update: 2026-02-23 07:10 GMT

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में कहा कि NEET-PG 2025 की कटऑफ में कमी से डॉक्टरों की क्षमता या योग्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि न्यूनतम मेडिकल योग्यता पहले ही MBBS डिग्री से प्रमाणित हो जाती है। NEET-PG केवल सीमित पोस्ट ग्रैजुएट सीटों के लिए मेरिट सूची तैयार करने की प्रक्रिया है।

केंद्र ने स्पष्ट किया,

“NEET-PG न्यूनतम योग्यता प्रमाणित करने की परीक्षा नहीं है। यह केवल सीमित पोस्ट ग्रैजुएट सीटों के आवंटन के लिए अभ्यर्थियों के बीच मेरिट तय करने का माध्यम है। NEET-PG के अंक सापेक्ष प्रदर्शन और प्रश्नपत्र की संरचना पर आधारित होते हैं, इन्हें नैदानिक अयोग्यता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।”

यह हलफनामा भारत संघ की ओर से दायर किया गया। इसमें कहा गया है कि मरीजों की सुरक्षा को लेकर उठाई जा रही चिंताएं निराधार हैं। सभी अभ्यर्थी पहले से ही रजिस्टर MBBS डॉक्टर हैं और स्वतंत्र रूप से मेडिकल करने के पात्र हैं। पोस्ट ग्रैजुएट के दौरान वे सीनियर प्राध्यापकों और विशेषज्ञों की निगरानी में कार्य करते हैं।

हलफनामे में कहा गया,

“पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा तीन वर्ष का संरचित और पर्यवेक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रम है। अंतिम योग्यता का कठोर मूल्यांकन एमडी और एमएस परीक्षाओं के माध्यम से किया जाता है, जिसमें सिद्धांत और प्रायोगिक दोनों में अलग-अलग कम से कम 50 प्रतिशत अंक अनिवार्य हैं। इसमें किसी प्रकार की छूट नहीं दी जाती, जिससे मानक सुरक्षित रहता है।”

केंद्र ने बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने बड़ी संख्या में संभावित रिक्त सीटों को देखते हुए पात्रता प्रतिशत कम करने का निर्णय लिया। इस निर्णय से अतिरिक्त 1,00,054 अभ्यर्थी तीसरे चरण की काउंसलिंग के लिए पात्र हो गए और कुल पात्र अभ्यर्थियों की संख्या 2,28,170 हो गई।

यह हलफनामा उस रिट याचिका में दायर किया गया, जिसमें 13 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड द्वारा जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई।

इस अधिसूचना के तहत NEET-PG 2025-26 के तीसरे चरण की काउंसलिंग के लिए न्यूनतम पात्रता प्रतिशत घटाया गया।

स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय में चिकित्सा शिक्षा के सहायक महानिदेशक डॉ. प्रवीण कुमार दास ने अपने हलफनामे में कहा कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए लगभग 70,000 स्नातकोत्तर सीटें उपलब्ध थीं और 2,24,029 अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हुए।

अखिल भारतीय कोटा की 31,742 सीटों में से दूसरे चरण के बाद 9,621 सीटें रिक्त रह गई थीं।

सरकार ने बताया कि इनमें से 5,213 सीटें सरकारी मेडिकल कॉलेजों में थीं, जिनमें अखिल भारतीय कोटा और DNB सीटें शामिल हैं।

हलफनामे में यह भी कहा गया कि NEET-PG में बैठने के लिए मान्यता प्राप्त MBBS डिग्री और अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी करना आवश्यक है। MBBS उत्तीर्ण करने के लिए भी सिद्धांत और प्रायोगिक परीक्षाओं में अलग-अलग कम से कम 50 प्रतिशत अंक अनिवार्य हैं।

केंद्र ने कहा कि NEET-PG में नकारात्मक अंकन प्रणाली के कारण कुछ अभ्यर्थियों को शून्य या ऋणात्मक अंक भी मिल सकते हैं लेकिन इससे उनकी नैदानिक क्षमता पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

सरकार ने यह भी बताया कि 2017 में NEET-PG शुरू होने के बाद से आवश्यक परिस्थितियों में पात्रता प्रतिशत में कमी की ग ताकि सीटें खाली न रहें। वर्ष 2023 में भी सभी वर्गों के लिए पात्रता प्रतिशत शून्य तक किया गया।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि नीतिगत निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित दायरे में होता है और जब तक कोई निर्णय स्पष्ट रूप से मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या कानून के विरुद्ध न हो, तब तक उसमें दखल नहीं दिया जाना चाहिए।

हलफनामे के अंत में कहा गया कि पोस्ट ग्रैजुएट सीटें राष्ट्रीय संसाधनों अस्पताल, संकाय और आधारभूत संरचना में बड़े निवेश का परिणाम हैं। इन्हें खाली छोड़ना सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी होगी और स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।

केंद्र ने कहा,

“पात्रता प्रतिशत में कमी एक संतुलित प्रशासनिक कदम है, जिसका उद्देश्य सीटों की बर्बादी रोकना और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना है। सीटों का आवंटन अब भी मेरिट और अभ्यर्थियों की वरीयता के आधार पर ही किया जाता है। इससे शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता नहीं होता और न ही किसी संस्थान को अनुचित लाभ मिलता है।”

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