क्या मुस्लिम महिला पति की सहमति के बिना खुला के ज़रिये विवाह समाप्त कर सकती है? सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केरल हाईकोर्ट के उस निर्णय के खिलाफ दायर अपील में वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम को एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) नियुक्त किया है, जिसमें यह माना गया था कि एक मुस्लिम महिला को पति की सहमति के बिना खुला के ज़रिये विवाह समाप्त करने का अधिकार है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने मामले को 22 अप्रैल 2026 को नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करते हुए कहा कि यह प्रकरण मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न से संबंधित है। अदालत ने कहा,
“हम इस मामले में श्री शोएब आलम, वरिष्ठ अधिवक्ता से सहायता का अनुरोध करते हैं, क्योंकि इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा प्रश्न शामिल है।”
यह मामला केरल हाईकोर्ट के उस फ़ैसले से उत्पन्न हुआ है, जिसमें हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि इस्लामी क़ानून मुस्लिम महिला को खुला के माध्यम से विवाह समाप्त करने का अधिकार देता है और यह अधिकार पति की इच्छा या सहमति पर निर्भर नहीं हो सकता।
केरल हाईकोर्ट का निर्णय
विवादित निर्णय में जस्टिस ए. मुहम्मद मुस्ताक़ और जस्टिस सी.एस. डायस की खंडपीठ ने अपने पहले के फ़ैसले की समीक्षा (review) याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि देश में ऐसा कोई तंत्र मौजूद नहीं है, जो पति की असहमति की स्थिति में पत्नी द्वारा विवाह समाप्ति को मान्यता दे सके, तो अदालत यह घोषित कर सकती है कि खुला पति की सहमति के बिना भी लागू किया जा सकता है।
अपने निर्णय की शुरुआत में हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह समीक्षा याचिका मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की इच्छा के अधीन दिखाने का प्रयास करती है और ऐसा प्रतीत होता है कि इसे पितृसत्तात्मक सोच और धार्मिक वर्चस्व से प्रेरित होकर दायर किया गया है, जो मुस्लिम महिलाओं के एकतरफा खुला के अधिकार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
यह समीक्षा याचिका Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 के तहत मुस्लिम महिला को दिए गए तलाक के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।
खुला को लेकर हाईकोर्ट की व्याख्या
अपने मूल निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा था कि क़ुरान मुस्लिम महिला को विवाह समाप्त करने का पूर्ण अधिकार देता है, और यह अधिकार पति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि खुला, पति को प्राप्त तलाक के अधिकार के समान ही महिला को प्राप्त अधिकार है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि खुला तब वैध होगा जब—
पत्नी विवाह समाप्ति की घोषणा करे,
मेहर या विवाह के दौरान प्राप्त किसी भौतिक लाभ को लौटाने की पेशकश करे, और
विवाह समाप्ति से पहले समाधान (reconciliation) का वास्तविक प्रयास किया गया हो।
अदालत की अहम टिप्पणी
समीक्षा याचिका में यह तर्क दिया गया था कि मुस्लिम महिला को पहले पति से तलाक़ की मांग करनी चाहिए और इंकार की स्थिति में क़ाज़ी या अदालत का रुख करना चाहिए। हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि अदालत न तो किसी वयस्क महिला की अभिभावक है और न ही उसे पति की ओर से तलाक़ “घोषित” करने की आवश्यकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि इस्लामी धर्मगुरुओं, जिनके पास औपचारिक कानूनी प्रशिक्षण नहीं है, पर मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े कानूनी प्रश्नों के निर्धारण के लिए पूरी तरह निर्भर नहीं हुआ जा सकता, हालांकि आस्था और धार्मिक आचरण से जुड़े मामलों में उनके विचारों को सम्मान दिया जा सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट में इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुनवाई होगी कि क्या मुस्लिम महिला का खुला के ज़रिये विवाह समाप्त करने का अधिकार पूर्ण और एकतरफा है, और इस संदर्भ में शीर्ष अदालत के निर्णय का व्यापक कानूनी और सामाजिक प्रभाव पड़ सकता है।