भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अपील के लिए 120 दिन की समयसीमा सख्त, देरी माफ नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 74 के तहत हाईकोर्ट में अपील दाखिल करने के लिए निर्धारित 120 दिनों की समयसीमा अनिवार्य और सख्त है। इस अवधि से आगे हुई देरी को माफ नहीं किया जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। पीठ ने Deputy Commissioner and Special Land Acquisition Officer v. SV Global Mill Limited मामले में दिए गए हालिया फैसले पर भी संदेह जताया, जिसमें कहा गया था कि ऐसी अपीलों में परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 लागू हो सकती है और पर्याप्त कारण होने पर देरी माफ की जा सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेजने से इनकार कर दिया।
क्या था मामला?
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी। यह याचिका जयपुर स्थित भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण (LARRA) के दो आदेशों से संबंधित थी।
पहला आदेश मई 2025 में पारित किया गया था, जिसमें 2013 के अधिनियम की धारा 64 के तहत पहले प्रतिवादी द्वारा मांगे गए संदर्भ को स्वीकार किया गया। दूसरा आदेश सितंबर 2025 में समीक्षा याचिका स्वीकार करते हुए पहले प्रतिवादी के पक्ष में मामूली संशोधन से संबंधित था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने माना था कि बोर्ड के पास धारा 74(1) के तहत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिका को अपील माना जाए, तब भी निर्धारित समयसीमा के बाद इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसके बाद बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
SV Global Mill फैसले पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने SV Global Mill Limited फैसले का हवाला देते हुए दलील दी कि धारा 74 के प्रावधान में निर्धारित 60 दिनों की अतिरिक्त अवधि को पूर्ण प्रतिबंध नहीं माना जा सकता और पर्याप्त कारण होने पर इससे आगे की देरी भी माफ की जा सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 74 की भाषा स्पष्ट है और इसमें निर्धारित अधिकतम 120 दिनों की अवधि के बाद देरी माफ करने की गुंजाइश नहीं है।
पीठ ने टिप्पणी की कि यदि 120 दिनों की बाहरी सीमा के बाद भी देरी माफ करने की अनुमति दी जाए, तो कानून द्वारा तय की गई समयसीमा का महत्व समाप्त हो जाएगा। इससे अत्यधिक विलंब से दाखिल अपीलों को भी स्वीकार करने की मांग की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि धारा 74(1) की भाषा से स्पष्ट है कि विधायिका का उद्देश्य 120 दिनों से आगे देरी माफ करने की अनुमति देना नहीं था। इस कारण परिसीमा अधिनियम की धारा 5 का लागू होना भी निहित रूप से बाहर है।
कई अन्य कानूनों में भी समयसीमा की बाहरी सीमा
पीठ ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992; मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996; विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999; धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002; विद्युत अधिनियम; कंपनी अधिनियम और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 जैसे कानूनों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि इन कानूनों में अपील या अन्य कार्यवाही के लिए निर्धारित अधिकतम समयसीमा को कई फैसलों में अनिवार्य माना गया है। ऐसे मामलों में 'इसके बाद नहीं' या 'इससे अधिक नहीं' जैसे शब्द विधायी आदेश को दर्शाते हैं, जिसके आगे अदालतें देरी माफ नहीं कर सकतीं।
पीठ ने कहा कि 2013 के अधिनियम की धारा 74(1) की भाषा भी ऐसे ही प्रावधानों के समान है। इसलिए SV Global Mill Limited का फैसला समान प्रावधानों पर पहले दिए गए न्यायिक निर्णयों के अनुरूप नहीं है।
भूमि मालिकों के हितों पर भी ध्यान दिया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि 2013 के अधिनियम को लाभकारी कानून मानकर धारा 5 के तहत असीमित देरी माफ करने की अनुमति दी जाती है, तो इससे भूमि अधिग्रहण करने वाली सरकारी संस्थाओं को भी अत्यधिक देरी से अपील दाखिल करने का अवसर मिल सकता है। इससे भूमि मालिकों को नुकसान हो सकता है।
पीठ ने Hukumdev Narain Yadav v. Lal Narain Mishra और CST v. Parson Tools and Plants जैसे फैसलों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि विशेष कानून की योजना और भाषा को देखते हुए परिसीमा अधिनियम के प्रावधानों के लागू होने या न होने का निर्धारण किया जाना चाहिए। अदालतें कानून की व्याख्या के नाम पर विधायिका द्वारा निर्धारित सीमा को बदल नहीं सकतीं।
बड़ी पीठ को मामला भेजने से इनकार
पीठ ने SV Global Mill Limited फैसले पर अपनी आपत्तियां दर्ज कीं, लेकिन मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कई पीठों द्वारा समान प्रावधानों की लगातार की गई व्याख्या और पूर्व निर्णयों को देखते हुए बड़ी पीठ के संदर्भ का विकल्प उपलब्ध नहीं था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि SV Global Mill Limited का अनुपात वर्तमान मामले पर लागू नहीं होता, क्योंकि राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने धारा 74 के तहत समयबद्ध अपील दाखिल नहीं की थी और न ही अधिकतम अनुमत अवधि के भीतर अपील करने का उपाय अपनाया था।
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने बोर्ड की चुनौती खारिज करके सही किया और उसके आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।