2007 CRPF कैंप हमला मामला : सुप्रीम कोर्ट 4 मौत की सज़ा पाए दोषियों की बरी किए जाने के खिलाफ यूपी सरकार की अपील पर करेगा सुनवाई

Update: 2026-02-17 07:17 GMT

सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2007 के CRPF कैंप आतंकी हमले मामले में मौत की सज़ा पाए 4 दोषियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील पर विचार करने जा रहा है। इस हमले में आठ जवानों की जान गई।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने हाल ही में राज्य सरकार द्वारा दायर चार विशेष अनुमति याचिकाओं में अनुमति प्रदान की।

विवादित निर्णय के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 में चार व्यक्तियों मोहम्मद शरीफ, इमरान शहजाद, मोहम्मद फारूक और सबाउद्दीन को दी गई मौत की सज़ा रद्द की थी। अदालत ने एक अन्य आरोपी जंग बहादुर खान उर्फ बाबा जिसे IPC की धारा 302 के तहत दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सज़ा दी गई थी उसकी सज़ा भी निरस्त की थी।

यह घटना 31 दिसंबर, 2007 की रात हुई थी, जब ज़मीन पर मौजूद प्रथम सूचनादाताओं ने CRPF ग्रुप सेंटर गेट नंबर 1 के पास लगातार गोलीबारी की आवाज़ सुनी।

चारों व्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या) और 149 (गैरकानूनी जमाव) के तहत दोषी ठहराते हुए मौत की सज़ा दी गई। इसके अलावा, उन्हें और आरोपी जंग बहादुर खान को गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA) की धारा 16 (आतंकी कृत्य करने की सज़ा) और धारा 20 (आतंकी संगठन या गिरोह का सदस्य होने की सज़ा) के तहत भी दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।

जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा,

“यदि इस मामले की जांच और अभियोजन अधिक प्रशिक्षित पुलिस द्वारा किया गया होता तो इसका परिणाम अलग हो सकता था। जब प्रत्यक्षदर्शी पहले से आरोपियों को नहीं जानते थे और घटना रात के अंधेरे में हुई, तब जांच एजेंसियों के लिए आवश्यक था कि गिरफ्तार व्यक्तियों को गुप्त (बेपर्दा/अप्रदर्शित) रखा जाता अभियोजन को इन परिस्थितियों में टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (पहचान परेड) कराने का अनुरोध करना चाहिए। जब FIR और CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज बयानों में आरोपियों की चेहरे से या नाम से पहचान का कोई उल्लेख नहीं था तब आवश्यक था कि आरोपियों को बेपर्दा रखकर केवल पहचान परेड के माध्यम से ही उनकी पहचान कराई जाती।”

अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था, इसलिए 1 जनवरी 2008 को सीआरपीएफ कैंप के शीशों से उठाए गए फिंगरप्रिंट को अत्यंत सुरक्षित अभिरक्षा में रखा जाना चाहिए था।

अदालत ने आगे कहा कि घटनास्थल से बरामद खाली कारतूस, हथियार आदि को पुलिस मालखाने में सुरक्षित रखा जाना चाहिए था।

न्यायालय ने यह भी पाया कि CRPF कर्मियों द्वारा कैंप से बरामद गोलियां परीक्षण के दौरान चलाई गई गोलियों से मेल नहीं खाती थीं, जिससे साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि यूएपीए के तहत अपराध सिद्ध नहीं हुआ।

आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत हत्या, गैरकानूनी जमाव, हत्या का प्रयास लोक सेवक को ड्यूटी से रोकने के लिए गंभीर चोट पहुंचाना तथा भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने या उसका प्रयास करने या उकसाने साथ ही UAPA सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम और शस्त्र अधिनियम के प्रावधानों के तहत आरोपों से बरी कर दिया गया।

हालांकि चूंकि आरोपियों के पास से आग्नेयास्त्र, हैंड ग्रेनेड, मैगज़ीन और कारतूस आदि बरामद हुए और वे इन प्रतिबंधित वस्तुओं के कब्जे में शस्त्र अधिनियम की आवश्यक शर्तों को पूरा किए बिना पाए गए, इसलिए अदालत ने उन्हें शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1-A) के तहत दोषी माना।

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