जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो नागरिक असहाय हो जाता है: सुप्रीम कोर्ट ने वसूली मामले में तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत रद्द की

Update: 2026-06-03 07:56 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कथित तौर पर एक जौहरी से जबरन वसूली के मामले में आरोपित तीन पुलिसकर्मियों को मिली अग्रिम जमानत रद्द की। अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि जब कानून लागू करने वाले ही वसूली करने लगें तो नागरिकों के सामने गहरा संकट खड़ा हो जाता है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कहा,

"जब कानून के रक्षक ही वसूली करने वाले बन जाएं, तब नागरिक संदेह और असमंजस में पड़ जाता है। विरोध करने पर तत्काल प्रतिशोध का खतरा होता है और उसके पास वर्दीधारी सत्ता के सामने चुपचाप झुक जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, भले ही अधिकारों का खुला दुरुपयोग हो रहा हो।"


मामला उस घटना से जुड़ा है जिसमें एक व्यक्ति अपनी नाबालिग बेटी और साले के साथ मुंबई से यात्रा कर रहा था। रेलवे स्टेशन पर पुलिसकर्मियों ने उन्हें रोककर तलाशी ली। तलाशी के दौरान 14 ग्राम की सोने की एक बिस्किट और 31,900 रुपये नकद मिलने का दावा किया गया। आरोप है कि इसके बाद उन्हें एक कमरे में ले जाया गया, जहां पुलिसकर्मियों ने सोने की बिस्किट लौटाने के बदले नकदी अपने पास रख ली।

पीड़ित की शिकायत पर FIR दर्ज हुई थी। सत्र अदालत ने आरोपित पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की थी, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज और FIR दर्ज कराने में हुई देरी का हवाला देते हुए उन्हें राहत दी थी।

हालांकि, महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से बताया गया कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया का वीडियो रिकॉर्ड होना चाहिए था, लेकिन संबंधित पुलिसकर्मी शिकायतकर्ता को ऐसे कमरे में ले गए, जहां कैमरे नहीं थे। यह भी बताया गया कि विभागीय जांच के बाद तीनों पुलिसकर्मियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को "संक्षिप्त और अपर्याप्त" बताते हुए कहा कि सीसीटीवी फुटेज में भले ही चेहरों के भाव स्पष्ट नहीं दिखते हों, लेकिन वहां मौजूद लोगों की गतिविधियों से तनाव और परेशानी के संकेत साफ नजर आते हैं। अदालत ने कहा कि दो वयस्क तेजी से आगे बढ़ रहे थे और उनमें से एक हाथों से लगातार इशारे कर रहा था, जबकि बच्ची पीछे चल रही थी। यह स्थिति स्पष्ट रूप से बेचैनी और दबाव की ओर संकेत करती है।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि जिस बंद कमरे में उन्हें ले जाया गया, वहां बिताया गया समय आरोपित कार्रवाई को अंजाम देने के लिए पर्याप्त था। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि आपराधिक मुकदमे के दौरान ही होगी।

अदालत ने यह तर्क भी खारिज किया कि बाद में सोने की बिस्किट लौटाए जाने से वसूली के आरोप कमजोर पड़ जाते हैं। कोर्ट के अनुसार, सोने की बिस्किट वापस करना उलटे अभियोजन के आरोपों को और मजबूती देता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने तलाशी के दौरान बरामद की गई कीमती वस्तुओं के संबंध में लागू मानक संचालन प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। इसके तहत जौहरी संघ द्वारा जारी पहचान पत्र की जांच, सीसीटीवी निगरानी वाले सुरक्षित स्थान पर तलाशी और संबंधित रजिस्टर में पूरी प्रविष्टि अनिवार्य है। हालांकि, अदालत के समक्ष प्रस्तुत रजिस्टर में शिकायतकर्ता का नाम दर्ज नहीं पाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पूरी कार्रवाई के दौरान मौजूद नाबालिग बच्ची के प्रति पुलिसकर्मियों ने अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखाई।

पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारियों द्वारा अधिकारों के दुरुपयोग के मामलों में अग्रिम जमानत देने को लेकर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों के लिए वही मानदंड लागू नहीं हो सकते जो सामान्य नागरिकों के लिए होते हैं।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए तीनों पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत समाप्त की। साथ ही स्पष्ट किया कि उसके सभी निष्कर्ष प्रथम दृष्टया हैं और केवल अग्रिम जमानत की उपयुक्तता से संबंधित हैं। मुकदमे की सुनवाई के दौरान इन टिप्पणियों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा।

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