2004 की राजस्थान कैडर सीट को लेकर दावा खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- कैडर आवंटन की प्रक्रिया अनंत काल तक खुली नहीं रह सकती

Update: 2026-02-06 07:54 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु कैडर के IPS अधिकारी की वह याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने वर्ष 2004 की राजस्थान कैडर की इनसाइडर रिक्ति पर नियुक्ति की मांग की थी।

अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि इतने वर्षों बाद कैडर बदलने या आवंटन में हस्तक्षेप करने से पूरी व्यवस्था अस्थिर हो जाएगी।

यह फैसला जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने सुनाया।

याचिकाकर्ता रुपेश कुमार मीणा जो 2004 बैच के IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में तमिलनाडु कैडर में कार्यरत हैं, उन्होंने यह दावा वर्ष 2010 में उठाया था यानी चयन वर्ष के लगभग छह साल बाद।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि 20 साल से अधिक पुराने मामलों में इस तरह के दावे स्वीकार किए जाने लगे तो कैडर आवंटन की प्रक्रिया कभी अंतिम रूप नहीं ले पाएगी।

अदालत ने टिप्पणी की कि एक अधिकारी के स्थानांतरण से नीचे मेरिट वाले अन्य अधिकारी भी इसी तरह के दावे करने लगेंगे जिससे पूरी चयन और नियुक्ति प्रक्रिया में अव्यवस्था फैल जाएगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि चयन प्रक्रिया को किसी न किसी बिंदु पर अंतिमता देना ज़रूरी है।

पूरा मामला

वर्ष 2004 की सिविल सेवा परीक्षा में ऋषिकेश मीणा का चयन IPS के लिए हुआ था। हालांकि वह पहले से ही 2003 बैच के IPS अधिकारी थे इसलिए उन्होंने 2004 बैच में शामिल होने से इनकार किया और राजस्थान की इनसाइडर रिक्ति भी स्वीकार नहीं की।

इसके बाद मेरिट सूची में अगले उम्मीदवार राजेश कुमार ने राजस्थान कैडर की इनसाइडर सीट की मांग की।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें राजस्थान कैडर आवंटित करने का निर्देश दिया। इस आदेश को केंद्र सरकार ने दिल्ली हाइकोर्ट में चुनौती दी।

मामले की सुनवाई के दौरान ही राजेश कुमार का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया और उन्होंने IAS जॉइन कर ली। इसके चलते आईपीएस कैडर से जुड़ा उनका विवाद समाप्त हो गया।

दिल्ली हाइकोर्ट ने 14 सितंबर 2010 को मामले का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट किया कि अधिकरण का आदेश मिसाल नहीं माना जाएगा और कानूनी प्रश्न खुला रहेगा।

इन्हीं घटनाक्रमों के बाद रुपेश कुमार मीणा जो मेरिट सूची में तीसरे स्थान पर थे उन्होंने दावा किया कि चूंकि उनसे सीनियर दोनों उम्मीदवारों ने राजस्थान की इनसाइडर सीट स्वीकार नहीं की, इसलिए उन्हें उस कैडर में नियुक्त किया जाना चाहिए।

उन्होंने 2011 में अधिकरण का दरवाज़ा खटखटाया।

हालांकि, अधिकरण ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि केवल इस आधार पर कोई अधिकार नहीं बनता कि वरिष्ठ उम्मीदवार ने सीट स्वीकार नहीं की।

दिल्ली हाइकोर्ट ने भी उक्त आदेश बरकरार रखा और पुनर्विचार याचिका खारिज की। इसके बाद मीणा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

सुप्रीम कोर्ट का रुख

सुप्रीम कोर्ट के सामने मीणा ने तर्क दिया कि वह कैडर बदलने की नहीं बल्कि एक सुधार की मांग कर रहे हैं क्योंकि सीनियर उम्मीदवारों के इनकार के बाद राजस्थान की इनसाइडर रिक्ति पर उनका अधिकार बनता था। उन्होंने यह भी कहा कि देरी उनकी ओर से नहीं हुई, क्योंकि स्थिति 2010 में स्पष्ट हुई थी।

केंद्र सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि एक बार कैडर आवंटन हो जाने के बाद चाहे वह इनसाइडर सीट ही क्यों न हो रिक्ति समाप्त मानी जाती है। वर्षों बाद ऐसे दावे स्वीकार करने से कैडर आवंटन की पूरी श्रृंखला प्रभावित होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की दलीलों से सहमति जताई।

अदालत ने कहा कि चयन वर्ष 2004 का है जबकि दावा छह साल बाद उठाया गया। इस बीच याचिकाकर्ता पिछले दो दशकों से तमिलनाडु कैडर में सेवा दे रहे हैं और 20 से अधिक सिविल सेवा चयन प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि यह दिखाने के लिए कोई सामग्री पेश नहीं की गई कि 2004 की राजस्थान इनसाइडर रिक्ति इतने वर्षों तक खाली रही हो।

इन सभी कारणों से सुप्रीम कोर्ट ने रुपेश कुमार मीणा की अपीलें खारिज कर दीं और कैडर आवंटन में अंतिमता के सिद्धांत को दोहराया।

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