NCLT में समाधान योजनाओं की मंजूरी में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, कहा- स्थिति बेहद गंभीर

Update: 2026-04-29 12:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) में समाधान योजनाओं की मंजूरी में हो रही भारी देरी पर स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे अत्यंत गंभीर स्थिति बताया।

अदालत ने कहा कि यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने NCLT प्रधान पीठ नई दिल्ली के रजिस्ट्रार की रिपोर्ट पर विचार करते हुए कहा कि स्थिति बेहद चिंताजनक और निराशाजनक है।

अदालत के समक्ष बताया गया कि समाधान योजनाओं की मंजूरी से संबंधित 383 आवेदन लंबित हैं। इनमें देरी 48 दिन से लेकर 738 दिन तक है, जबकि कुछ मामलों में चार वर्ष तक लंबित रहने की स्थिति सामने आई है।

खंडपीठ ने कहा कि इतनी लंबी देरी दिवाला कानून की मूल भावना के विपरीत है, क्योंकि यह समयबद्ध समाधान परिसंपत्तियों के मूल्य संरक्षण और आर्थिक दक्षता के उद्देश्य को प्रभावित करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि NCLT में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की भारी कमी है। स्वीकृत पदों की संख्या जहां 63 है, वहीं वर्तमान में केवल 28 न्यायिक और 26 तकनीकी सदस्य कार्यरत हैं।

अदालत ने कहा कि इस कमी के कारण पीठों की संरचना बार-बार बदल रही है। कई स्थानों पर आधे दिन की बैठकों तक सीमित रहना पड़ रहा है, जिससे लंबित मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है।

पीठ ने यह भी आश्चर्य जताया कि NCLT के रजिस्ट्रार का पद संविदा आधारित है। अदालत ने कहा कि इतने महत्वपूर्ण वाणिज्यिक विवादों का निपटारा करने वाले न्यायाधिकरण में इस प्रकार की व्यवस्था अकल्पनीय है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

“हम व्यापक जनहित में स्वतः संज्ञान लेते हैं। इन मुद्दों का युद्धस्तर पर समाधान आवश्यक है अन्यथा IBC का उद्देश्य विफल हो जाएगा।”

इसके बाद अदालत ने मामले को आगे के आदेशों के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि में एक दिवाला विवाद है, जिसमें समाधान योजना जुलाई 2024 में NCLT के समक्ष मंजूरी के लिए दाखिल की गई, लेकिन लगभग दो वर्ष बाद भी उस पर निर्णय नहीं हो सका। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने इसे व्यापक संस्थागत समस्या मानते हुए हस्तक्षेप किया।

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