केवल एक निर्णायक बिंदु पर नहीं, उठे हर मुद्दे पर देना होगा निर्णय : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी मामले में उत्पन्न सभी मुद्दों पर निर्णय देना न्यायालय का दायित्व है और केवल एक निर्णायक बिंदु तक अपनी जांच सीमित नहीं रखी जा सकती।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें केवल एक मुद्दे पर ध्यान दिया गया था और अपीलकर्ता के खिलाफ चलाए गए अनुशासनात्मक कार्यवाही की जड़ से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नों की अनदेखी की गई थी।
मामले में अपीलकर्ता को 2017 में शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए उसने नागपुर स्थित स्कूल ट्रिब्यूनल का रुख किया, जिसने अगस्त 2019 में बर्खास्तगी आदेश रद्द करते हुए उसे सभी परिणामी लाभों सहित पुनः नियुक्त करने का निर्देश दिया। इसके बाद प्रबंधन ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। 5 सितंबर 2024 को एकल न्यायाधीश ने याचिका स्वीकार करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए ट्रिब्यूनल को वापस भेज दिया, मुख्यतः इस आधार पर कि ट्रिब्यूनल ने यह नहीं देखा कि क्या प्रबंधन के सचिव को अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के लिए विधिवत अधिकृत किया गया था। कर्मचारी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी गई, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाया और केवल प्रबंधन के प्रस्ताव से संबंधित मुद्दे पर विचार किया, जबकि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न को नजरअंदाज कर दिया गया। उसका कहना था कि उसे प्रतिवादी पक्ष के गवाहों से जिरह करने का अवसर नहीं दिया गया, जिससे उसे प्रभावी सुनवाई का अधिकार नहीं मिला।
खंडपीठ ने अपीलकर्ता के तर्क में दम पाते हुए कहा कि जब किसी मामले में अनेक मुद्दे विचारणीय हों, तो न्यायालय का कर्तव्य है कि प्रत्येक मुद्दे पर कारण सहित निर्णय दे। अदालत ने कहा कि सभी मुद्दों पर विचार करने से न केवल स्पष्टता और अंतिमता सुनिश्चित होती है, बल्कि पक्षकारों के व्यापक निर्णय पाने के अधिकार का भी सम्मान होता है और अपीलीय अदालत को भी एक तर्कसंगत निर्णय का लाभ मिलता है।
सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के आरोपों पर विचार न करना हाईकोर्ट के आदेश में एक मूलभूत त्रुटि है, जिससे उसका आदेश दोषपूर्ण हो जाता है। इसलिए 5 सितंबर 2024 का आदेश निरस्त करते हुए मामले को सभी पक्षों के दावों और बचावों के आलोक में पुनः विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया गया।
हालांकि अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुकी है। इसलिए हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि पुनः सुनवाई के दौरान यह भी तय किया जाए कि क्या ट्रिब्यूनल द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई में हस्तक्षेप उचित था और यदि हाँ, तो क्या अपीलकर्ता को बकाया वेतन और सेवानिवृत्ति लाभ मिलेंगे।
साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया गया कि मामले को उपयुक्त पीठ को सौंपा जाए और यथासंभव चार महीने के भीतर इसका निपटारा किया जाए। पक्षकारों को आपसी समझौते या मध्यस्थता की संभावना तलाशने की भी स्वतंत्रता दी गई।