राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग में नियुक्तियों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी, चार सप्ताह का दिया अंतिम अवसर

Update: 2026-01-30 09:25 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति में हो रही लगातार देरी पर गहरी नाराज़गी जताई। कोर्ट ने कहा कि बार-बार दिए गए आश्वासनों के बावजूद अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई और नियुक्तियों की प्रक्रिया अत्यंत धीमी गति से आगे बढ़ रही है।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने 27 जनवरी को पारित आदेश में केंद्र सरकार को अंतिम अवसर देते हुए कहा कि यदि चार सप्ताह के भीतर राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं की गई तो सुप्रीम कोर्ट को आयोग का कार्य संभालने के लिए एक अंतरिम (एडहॉक) समिति गठित करनी पड़ेगी।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में पहले भी कई बार निर्देश दिए गए। सॉलिसिटर जनरल तथा एडिशनल सॉलिसिटर जनरल की ओर से बार-बार यह भरोसा दिलाया गया कि नियुक्तियां शीघ्र की जाएंगी। इसके बावजूद मामला बार-बार टलता रहा और अब तक कोई सार्थक प्रगति नहीं दिखी। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुपालन हलफनामा स्वयं यह दर्शाता है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया 'घोंघे की चाल' से चल रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह केंद्र सरकार द्वारा दायर जवाब से संतुष्ट नहीं है और यदि तय समयसीमा में नियुक्तियां नहीं की गईं तो कोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए आयोग के कार्यों के संचालन के लिए एडहॉक समिति नियुक्त करनी होगी।

इससे पहले 20 जनवरी को कोर्ट ने केंद्र सरकार को नियुक्तियों की समय-सीमा बताते हुए हलफनामा दाखिल करने की अनुमति दी थी। हालांकि, 27 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि दाखिल हलफनामे से यह प्रतीत होता है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग में रिक्त पदों को भरने को लेकर गंभीर नहीं है, जबकि पूर्व में बार-बार आश्वासन दिए गए।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग भारत सरकार का वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग अधिनियम, 1993 के तहत की गई। आयोग का उद्देश्य सफाई कर्मचारियों, विशेषकर मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसे खतरनाक और अमानवीय कार्यों में लगे श्रमिकों के अधिकार, गरिमा और कल्याण की रक्षा करना है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर, 2023 में एक व्यापक निर्णय पारित करते हुए मैनुअल स्कैवेंजिंग के दौरान मृत्यु होने पर मुआवजे की राशि बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी थी। इसके बाद कोर्ट समय-समय पर मैनुअल स्कैवेंजिंग और सीवर सफाई की प्रथा के पूर्ण उन्मूलन को लेकर कई निर्देश जारी करता रहा है। जनवरी, 2025 में कोर्ट ने देश के प्रमुख महानगरों में इस प्रथा की निगरानी को लेकर भी आदेश दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कि अपने ही भवन परिसर के बाहर मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा का संज्ञान लेते हुए संबंधित अधिकारियों को मुआवजा देने के निर्देश भी जारी किए। ऐसे में आयोग में लंबे समय से नियुक्तियों का न होना कोर्ट के अनुसार अत्यंत चिंताजनक है और सफाई कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य को कमजोर करता है।

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