हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा—संविधान की आत्मा 'बंधुत्व' को बनाए रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी

Update: 2026-04-30 18:42 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच (घृणा भाषण) के मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी भाषा संविधान के मूल मूल्य 'बंधुत्व' (Fraternity) के खिलाफ है और समाज की नैतिक संरचना को कमजोर करती है। हालांकि, कोर्ट ने इस विषय पर कोई सामान्य दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया और कहा कि नए अपराध बनाना विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि संविधान केवल संस्थाओं या कानूनों से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों की उसके मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से जीवित रहता है। अदालत ने सभी नागरिकों और सार्वजनिक व्यक्तियों से अपील की कि वे अपने शब्दों के प्रभाव को समझें और जिम्मेदारी के साथ सार्वजनिक संवाद करें।

कोर्ट ने कहा, “एक संवैधानिक लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संयम और जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। विविधता से भरे समाज में बोले गए शब्दों के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हेट स्पीच को नियंत्रित करने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा पर्याप्त है और इसमें किसी प्रकार की विधायी कमी (legislative vacuum) नहीं है। यदि भविष्य में संशोधन की आवश्यकता हो, तो यह निर्णय केंद्र और राज्य सरकारों के विवेक पर निर्भर करेगा।

अपने फैसले में कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना (Preamble) का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—ये सभी मूल मूल्य भारत के संवैधानिक ढांचे की नींव हैं। विशेष रूप से 'बंधुत्व' को एक ऐसे सिद्धांत के रूप में रेखांकित किया गया, जो विविध समाज में एकता और सौहार्द बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच की जड़ 'हम बनाम वे' की मानसिकता में होती है, जो समाज में विभाजन और भेदभाव को बढ़ावा देती है। “जब तक यह सोच बनी रहेगी, तब तक संविधान में निहित बंधुत्व का लक्ष्य अधूरा रहेगा,” फैसले में कहा गया।

अदालत ने भारत की सांस्कृतिक परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना इस देश की पहचान रही है, जहां विभिन्न समुदायों को न केवल शरण मिली बल्कि उन्हें स्वीकार और आत्मसात भी किया गया। ऐसे में विभाजनकारी भाषण इस विरासत के विपरीत हैं।

साथ ही, कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 51A का उल्लेख करते हुए कहा कि हर नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह सभी लोगों के बीच सद्भाव और भाईचारे की भावना को बढ़ावा दे, चाहे वे किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र या वर्ग से हों।

इस मामले में कोर्ट ने एक संबंधित याचिका में अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा के खिलाफ 2020 के भाषणों को लेकर हेट स्पीच का मामला भी खारिज कर दिया।

फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हेट स्पीच और अफवाह फैलाने जैसे मुद्दे सीधे तौर पर संवैधानिक व्यवस्था, गरिमा और सामाजिक एकता को प्रभावित करते हैं। ऐसे में विधायिका चाहे तो बदलती परिस्थितियों के अनुसार कानून या नीतियों में संशोधन पर विचार कर सकती है।

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