सह-आरोपियों पर आदेश लागू होने की स्थिति स्पष्ट न करने पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, कहा- हाईकोर्ट जज ने जिम्मेदारी निभाने में की चूक

Update: 2026-03-23 10:52 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने के आदेश की सीमा स्पष्ट न करने पर कड़ी नाराज़गी जताई है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा स्पष्टीकरण देने से इनकार करने से ट्रायल कोर्ट में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि उसी एफआईआर से संबंधित लंबित याचिकाओं को उस न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य पीठ को सौंपा जाए, जिसने पूर्व में आदेश पारित किए थे, और उन्हें तीन माह के भीतर निस्तारित किया जाए।

“स्पष्टीकरण न देना पूरी तरह त्रुटिपूर्ण”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पष्टीकरण याचिका को “गलत समझा गया” बताकर खारिज करना और वह भी बिना कारण बताए (non-speaking order) पूरी तरह गलत है। कोर्ट ने कहा कि एकल न्यायाधीश ने स्थिति स्पष्ट करने की जिम्मेदारी नहीं निभाई, जिससे सह-आरोपियों द्वारा ट्रायल कोर्ट में भ्रम पैदा किया गया।

आदेश केवल एक आरोपी तक सीमित

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 19 दिसंबर 2025 का हाईकोर्ट का आदेश, जिसमें आपराधिक कार्यवाही निरस्त की गई थी, केवल आरोपी मालू (Maloo) के पक्ष में लागू था और स्वतः अन्य सह-आरोपियों पर लागू नहीं हो सकता।

इसके परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा अन्य सह-आरोपियों को भी उस आदेश का लाभ देने वाले आदेश को रद्द कर दिया और सभी आरोपियों के खिलाफ सत्र वाद (Sessions Trial) को पुनर्जीवित कर दिया, सिवाय मालू के।

ट्रायल कोर्ट को भी दी चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को भी चेताया कि वह अनावश्यक रूप से व्याख्या से जुड़े मुद्दे न उठाए या उठाने दे, क्योंकि इससे न्याय में देरी और त्रुटि हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश स्पष्ट था और ट्रायल कोर्ट को अभियोजन से स्पष्टीकरण मांगने की आवश्यकता नहीं थी।

मामले का विवरण

यह मामला गौतमबुद्ध नगर में लगभग 300 बीघा जमीन गरीब किसानों से कथित रूप से दबाव डालकर खरीदने के आरोपों से जुड़ा है। इस मामले में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।

अन्य लंबित याचिकाएं दूसरी पीठ को सौंपने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस एफआईआर से संबंधित लगभग 8 याचिकाएं हाईकोर्ट में लंबित हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन सभी याचिकाओं को किसी अन्य न्यायाधीश/पीठ को सौंपा जाए, ताकि वे पूर्व आदेशों से प्रभावित हुए बिना सुनवाई कर सकें।

साथ ही, नई पीठ को यह तय करने के लिए कहा गया है कि सत्र वाद पर स्थगन जारी रखा जाए या नहीं, और इन याचिकाओं का निस्तारण तीन माह के भीतर करने का प्रयास किया जाए।

अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति ट्रायल कोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट को भेजने के निर्देश भी दिए।

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