आरोपियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर दिशानिर्देश की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने निपटाई
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने शुक्रवार को पुलिस द्वारा अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स पर आरोपियों की तस्वीरें पोस्ट करने को लेकर दिशानिर्देश बनाने की मांग वाली याचिका का निस्तारण कर दिया। कोर्ट ने कहा कि हाल ही में पीयूसीएल से जुड़े एक मामले में राज्यों को पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग के लिए दिशानिर्देश बनाने का निर्देश दिया गया है, जिनमें सोशल मीडिया पोस्टिंग भी शामिल हो सकती है।
कोर्ट ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता उन दिशानिर्देशों के तैयार होने का इंतजार करें। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल संकरनारायणन ने याचिका वापस ले ली। इस मामले की सुनवाई जस्टिस जॉयमल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने की।
आरोपियों की तस्वीरों पर आपत्ति
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि पुलिस द्वारा आरोपियों की हथकड़ी लगे, रस्सियों से बंधे, परेड कराए जाते या घुटनों के बल बैठाए गए फोटो सोशल मीडिया पर डालना उनकी व्यक्तिगत गरिमा का उल्लंघन है। इससे जनता में पूर्वाग्रह भी पैदा होता है और “मीडिया ट्रायल” को बढ़ावा मिलता है।
याचिका में विशेष रूप से गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, असम और छत्तीसगढ़ पुलिस के सोशल मीडिया अकाउंट्स को लेकर चिंता जताई गई थी।
कोर्ट की टिप्पणी: निष्पक्ष जांच जरूरी
जस्टिस बागची ने कहा कि पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग जिम्मेदार और निष्पक्ष होनी चाहिए, क्योंकि जांच एजेंसी न तो पीड़ित के पक्ष में होती है और न ही आरोपी के। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसी का कर्तव्य केवल सत्य का पता लगाना है और मीडिया ट्रायल से न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने यह भी चिंता जताई कि भले ही पुलिस पर नियंत्रण के लिए दिशानिर्देश बनाए जाएं, लेकिन तीसरे पक्ष—खासतौर पर मीडिया और सोशल मीडिया—द्वारा फैलाए गए नैरेटिव से वातावरण दूषित हो सकता है।
सोशल मीडिया युग में नई चुनौती
याचिकाकर्ता ने बताया कि “मीडिया ट्रायल” का मुद्दा पहले सहारा बनाम सेबी 2012 में उठाया गया था। इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की कि वह फैसला “अधिक सरल समय” में आया था, जब सोशल मीडिया इतना प्रभावी नहीं था।
सीजेआई सूर्यकांत ने भी कहा कि आजकल लोग दुर्घटनाओं में मदद करने के बजाय वीडियो बनाने में अधिक रुचि दिखाते हैं, जो समाज में बदलती प्रवृत्ति को दर्शाता है।
“डिजिटल अरेस्ट” जैसी स्थिति: सीजेआई
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुख्यधारा मीडिया काफी हद तक जिम्मेदार है, लेकिन कई वर्चुअल टैब्लॉइड्स ब्लैकमेलर की तरह काम कर रहे हैं।
इस पर सीजेआई ने टिप्पणी की कि ऐसी ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग “डिजिटल अरेस्ट” जैसी स्थिति पैदा करती है, हालांकि अभी कानून में इसे अपराध के रूप में स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई है।
व्यापक याचिका दाखिल करने की छूट
अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए कहा कि वे पुलिस, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और आम जनता—तीनों को शामिल करते हुए एक व्यापक याचिका दाखिल कर सकते हैं।