IVF केंद्रों के दुरुपयोग से बाल तस्करी की आशंका, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने ART (Assisted Reproductive Technology) और सरोगेसी केंद्रों के माध्यम से संभावित बाल तस्करी को रोकने के लिए एक विशेष तंत्र और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) की आवश्यकता पर विचार शुरू किया है। अदालत ने यह चिंता उस समय जताई जब न्यायमित्र (Amicus Curiae) वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने बताया कि वर्तमान कानूनी ढांचे में ऐसे मामलों को रोकने के लिए कोई विशेष SOP मौजूद नहीं है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विश्वनाथन की पीठ 'पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' बाल तस्करी मामले में अप्रैल 2025 के फैसले के अनुपालन की समीक्षा कर रही थी। सुनवाई के दौरान न्यायमित्र ने बताया कि एक चल रही बाल तस्करी जांच में कुछ आरोपी खुद को IVF केंद्र से जुड़े "एग डोनर" बता रहे थे, जिससे ART और सरोगेसी केंद्रों के दुरुपयोग की आशंका सामने आई है।
अपर्णा भट्ट ने अदालत को बताया कि ART अधिनियम, 2021 और सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत नियामक संस्थाएं तो गठित कर दी गई हैं, लेकिन बाल तस्करी की रोकथाम के लिए कोई विशेष दिशानिर्देश या SOP नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति गठित कर ऐसी SOP तैयार की जाए।
न्यायमित्र ने NCRB के 2024 के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि देश में 6,000 से अधिक मानव तस्करी के मामले दर्ज हुए और 1.47 लाख से अधिक बच्चे अब भी लापता हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि तस्करी अब केवल यौन शोषण या बंधुआ मजदूरी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि अवैध गोद लेने, विवाह, अंगों की तस्करी और अन्य उद्देश्यों तक फैल चुकी है।
सुनवाई के बाद पीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे को न्यायमित्र के सुझावों पर केंद्र सरकार का पक्ष रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त 2026 को होगी।